बसंत ऋतु में आहार-बिहार

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वसन्त-ऋतु सब ऋतुओं से सुहानी होती है। इसमें सब जगह प्रकृति की सुन्दरता दिखाई देती है। रंग-बिरंगे फूलों की सुन्दरता और सुगन्ध से ऐसा लगता है,मानो प्रकृति प्रसन्न मुद्रा में है। यह ऋतु शीतकाल और ग्रीष्म-काल का सन्धि समय होता है। मौसम समशीतोष्ण होता है अर्थात् न तो कँपकँपाती सर्दी होती है और न ही कड़ाके की धूप या गर्मी ही। मौसम मिला-जुला होता है, दिन में गर्मी और रात में सर्दी होती है।
शरीर पर प्रभाव
मकर संक्रान्ति से शिशिर ऋतु समाप्त होकर अब वसंत ऋतु का प्रारंभ हुआ है। इस ऋतु में सूर्य की किरणें तेज होने लगती हैं। शीत-काल (हेमन्त और शिशिर ऋतुओं) में शरीर के अन्दर जो कफ जमा हो जाता है, वह इन किरणों की गर्मी से पिघलने लगता है। इससे शरीर में कफ दोष कुपित हो जाता है,और कफ से होने वाले रोग (जैसे- खाँसी, जुकाम, नजला, दमा,गले की खराश, टॉन्सिल्स, पाचन-शक्ति की कमी, जी-मिचलाना आदि) उत्पन्न हो जाते हैं। वातावरण में सूर्य का बल बढ़ने और चंद्रमा की शीतलता कम होने से जलीय अंश और चिकनाई कम होने लगती है। इसका प्रभाव शरीर पर पड़ता है और दुर्बलता आने लगती है। अतः इस ऋतु में खान-पान का विशेष ध्यान रखना चाहिए। अम्ल, मधुर और लवण रस वाले पदार्थ खाने से कफ में वृद्धि होती है।
चरक संहिता के अनुसार-
गुर्वम्ल स्निग्ध मधुरं दिवास्वप्नम् च वर्जयेत्
वसंत ऋतु में भारी पदार्थ, अम्ल पदार्थ, स्निग्ध और मधुर पदार्थ का आहार ग्रहण नहीं करना चाहिए। दिन में सोना भी नहीं चाहिए।
जिन लोगों ने-
शीत ऋतु में कोई पसीना बहाने वाली मेहनत नहीं की, या सूर्य नमस्कार नहीं किए;
जो दोपहर को सोया किये;
जिनके वजन अधिक हैं;
जिन्होंने शीत ऋतु में आइसक्रीम या ठंडे पदार्थ, अत्यधिक तेल युक्त पदार्थ खाए हैं;
जिन्होंने नींबू पानी, शहद, अदरक, गुड, लेमन ग्रास, तुलसी, अडूसा, हल्दी, पिप्पली चटनी, काढ़ा, अजवाइन, हींग, मुलेठी, मेथी, बथुआ, इत्यादि कफ नाशक पदार्थों का सेवन नहीं किया;जो प्रातः देर से उठे;
जिनके शरीर में चर्बी की मात्रा अभी बढ़ी है;
उन सभी के शरीर में कफ जमा है, जो वसंत ऋतु में पतला होकर बाहर निकलना चाहेगा। यदि इस ऋतु में सही तरीके से उसकी निकासी नहीं हुई और उसे रोकने के लिए विभिन्न दवाएँ ली गईं तो मधुमेह, त्वचा रोग, एलर्जी, जैसी समस्याएं होने की संभावना रहेगी।अतः उपरोक्त सूची के अनुसार अपनी जांच करें और जो भूलें अभी तक हुई हैं,उन्हें सुधार लें।
जिन्हें इस ऋतु में अस्थमा, सूखी खांसी, नाक बंद, सर दर्द, गला दर्द होता है वह नींबू,शहद,सेंधा नमक,अदरक पानी अवश्य लें। जिन्हें छींकें, आंख नाक कान में खुजली होना नाक बहना आदि समस्याएं हैं वह वसंत ऋतु में नींबू पानी न लें। पिप्पली चटनी, कोरोना सुरक्षा काढ़ा, अडूसा तुलसी गिलोय हल्दी का रस अवश्य लें।
पिप्पली चटनी, कोरोना सुरक्षा काढ़ा, अडूसा तुलसी गिलोय हल्दी का रस तो कैसी भी सर्दी खांसी अस्थमा कफ हो उसमें लाभ ही पहुंचाएगा।
ध्यान रहे, यह सब नहीं लेने पर एंटी एलर्जिक या कोई अन्य एलोपैथिक दवा लेंगे तो इसके दुष्परिणाम आगे थायराइड, त्वचा रोग, मधुमेह आदि के रूप में सामने आएंगे। इसलिए वसंत ऋतु में सर्दी खांसी का कष्ट अधिक होता है तो भी डरें नहीं, यह ऋतु समाप्त होने पर वह सब ठीक भी हो जाएगा।
पथ्य आहार-विहार
इस ऋतु में ताजा हल्का और सुपाच्य भोजन करना चाहिए। कटु रस युक्त, तीक्ष्ण और कषाय पदार्थों का सेवन लाभकारी है। मूँग, चना और जौ की रोटी, पुराना गेहूँ और चावल, जौ, चना, राई, भीगा व अंकुरित चना, मक्खन लगी रोटी, हरी शाक-सब्जी एवं उनका सूप, सरसों का तेल, सब्जियों में- करेला, लहसुन, पालक, केले के फूल, जिमीकन्द व कच्ची मूली, नीम की नई कोपलें, सोंठ, पीपल, काली मिर्च, हरड़, बहेड़ा,आँवला,धान की खील,खस का जल, मौसमी फल तथा शहद का प्रयोग बहुत लाभकारी है। जल अधिक मात्रा में पीना चाहिए। अदरक डाल कर तथा शहद मिलाकर जल तथा वर्षा का जल पीना चाहिए। कफ को कम करने के लिए वमन (गुनगुना जल पीकर गले में अंगुली डालकर उल्टी करना), हरड़ के चूर्ण का शहद के साथ मिला कर सेवन करना उपयोगी है। नियमित रूप से हल्का व्यायाम अथवा योगासन करना चाहिए। सूर्योदय से पहले भ्रमण करने से स्वास्थ्य में वृद्धि होती है। तैल मालिश करके तथा उबटन लगा कर गुनगुने पानी से (आदत होने पर ठण्डे ताजे पानी से) स्नान करना हितकारी है। स्नान करते समय मलविसर्जक अंगों की सफाई ठीक प्रकार से करनी चाहिए। सिर पर टोपी व छाते का प्रयोग करने से धूप से बचा जा सकता है। स्नान के बाद शरीर पर कपूर, चन्दन, कुंकुम आदि सुगन्धित पदार्थों का लेप लाभकारी होता है।
वसंत ऋतु में ऋतु अनुसार निम्न बातों का ध्यान रखें-
अब लेमन ग्रास, गुड या अत्यधिक गर्म वस्तुओं के काढ़े का सेवन प्रतिदिन न करें। वसंत ऋतु के बाद गुड़ पानी लिया जा सकता है। पलाश के फूल का उपयोग स्नान के पानी में उबालकर करना शुरू कर दें। जिन्हें त्वचा पर सीत का उभार होता रहता है, उन्हें यह करना अत्यंत आवश्यक है। त्वचा पर सीत के उभार होने पर अदरक के स्थान पर सोंठ का उपयोग करें। हमारे यहां सोंठ अदरक को 12 घंटे दूध में भिगोकर तैयार की जाती है। आप भी वैसा ही कर सकते हैं। किंतु अब बाजार से सीधे सोंठ खरीद कर न लें। जिन्हें त्वचा की कोई समस्या है, वह जादू मिट्टी का प्रयोग अब शुरू कर सकते हैं। स्नान करते समय उबटन का भी उपयोग कर सकते हैं। अपने यहां के उबटन में पलाश फूल का चूर्ण डाला हुआ है। पित्त की अधिकता वाले लोगों को सीत का उभार होता है, अतः उन्हें रूखे, तीखे, गर्म या तले हुए, अत्यंत खट्टे अत्यंत नमकीन पदार्थ नहीं खाने चाहिए। गर्म पानी या गर्म पेय जैसे चाय, कॉफी भी कम ही लेना चाहिए। दही अत्यंत पित्तवर्धक होता है। उसके स्थान पर छाछ में गुलाब शरबत,चंदन शरबत या रूह-अफ-जा डालकर सेवन करें।वसंत ऋतु में शरीर से कफ पतला होकर बाहर निकलता है। इसलिए कफ की अधिकता वाले लोगों को सर्दी खांसी बार-बार होती है। छींकें और एलर्जी भी इसी ऋतु में होते हैं। इसलिए आप लोगों ने अनेक लोगों को पोलन एलर्जी होना कहते सुना होगा। धूल या पोलन एलर्जी अथवा नाक बहने वाली सर्दी आदि अधिक होती है,उन्हें अदरक का रस बराबरी से शहद मिलाकर लेना चाहिए। खांसी होने पर अडूसा, तुलसी, गिलोय, ग्वारपाठा, हल्दी इत्यादि का सेवन करें। मध्यम पिप्पली चटनी का नियमित सेवन करें। जिन्हें अस्थमा या फेफड़ों के जीर्ण रोग जैसे CLD अथवा फेफड़ों का कैंसर इत्यादि है, उन्हें तो तीव्र पिप्पली चटनी नियमित लेना चाहिए। नहीं लेते हों तो अभी से शुरू कर ही देना चाहिए।
अपथ्य आहार-विहार
वसन्त-ऋतु में भारी, चिकनाई युक्त, खट्टे (इमली, अमचूर) व मीठे (गुड़, शक्कर) एवं शीत प्रकृति वाले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। नींबू कफ पतला करके शरीर से बाहर निकालता है अतः जिनके शरीर में यह प्रक्रिया स्वयं ही प्रारम्भ हो चुकी हो वे नींबू का सेवन कुछ समय तक न करें। नया अनाज, उड़द, रबड़ी, मलाई जैसे भारी भोज्य पदार्थ व खजूर का सेवन भी ठीक नहीं है। खुले आसमान में,नीचे ओस में सोना, ठण्ड में रहना, धूप में घूमना तथा दिन में सोना भी हानिकारक है। आजकल बाजार में माल जल्दी पहुंचाने की होड़ में ऋतु से पहले ही कुछ माल आने लगता है। फल पकने से पहले ही कार्बाइड से पका कर ठेलों पर पहुंच जाते हैं। बाजार में मिलने वाले खट्टे और कच्चे आम, अंगूर, संतरे आदि फलों का सेवन न करें। यद्यपि गन्ने का रस अभी से मिलने लगा है, पर वह भी होली के बाद ही लेना शुरू करें। इसके विपरीत शहद कफ नाशक होने के कारण मीठा होते हुए भी इस ऋतु में लिया जाना चाहिए।
शोधन कर्म- कफ दोष शमन हेतु वमन एवं नस्य
पंचकर्म केंद्र में जाकर नस्य लिया जा सकता है और घर पर भी स्टीमर में कपूर डाल कर भाप ली जा सकती है। जिन्हें अधिक सर्दी जुकाम या छींक आती हैं, उन्हें लगातार मास्क पर अमृतधारा बाहर से लगाकर मास्क लगाए रखना चाहिए। कड़वे और कषाय अर्थात कसैले पदार्थ का सेवन अधिक करना चाहिए, इसलिए प्रातः कड़वी नीम की दातून या स्वदेशी दन्त मंजन से प्रातः अच्छी तरह तालु तक साफ करके अधिक से अधिक चिकनाई निकाल देना चाहिए। यह वमन या कुंजल जैसा ही है। नेति, कुंजल या योग में बताई गई धौति क्रिया करने से और भी अधिक लाभ मिलेगा। पंचकर्म एवं योग की शोध क्रियाएं हमें स्वस्थ रहने के लिए होती हैं,अतः ऋतु अनुसार कोई रोग न भी हो तो भी यह सब करना चाहिए।

*डॉ. पूर्णिमा जाते
(लेखिका आयुर्वेद एवं रसाहार चिकित्सा की विशेषज्ञ हैं।)

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