‘एकात्म धाम’ : आचार्य शंकर की ज्ञानभूमि पर अद्वैत का वैश्विक केंद्र

पुरु शर्मा By पुरु शर्मा
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भारत की सांस्कृतिक चेतना एक अखंड प्रवाह है। इस प्रवाह में अनेक ऋषियों, मुनियों, दार्शनिकों, संतों और साधकों का पुण्य-प्रताप समाहित है। जब-जब यह प्रवाह किसी बाहरी झंझावात से अवरुद्ध हुआ, जब-जब इस देश की आत्मा पर संशय के बादल छाए, जब-जब विखंडन की शक्तियों ने एकता के सूत्र को काटने का प्रयास किया और हमारी चेतना पर अज्ञान एवं विभाजन का आवरण चढ़ा; तब-तब कई ऐसी विभूतियाँ यहाँ जन्मीं, जिन्होंने भारत के आध्यात्मिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक मानचित्र को नए सिरे से उकेरा। आचार्य शंकर ऐसे ही एक मनीषी थे, जिन्होंने नाना प्रकार के मतभेदों से जर्जर समाज को एकात्मता का अमृत दिया।

जब बौद्ध दर्शन की शाखाएँ अपने मूल से विलग होकर भ्रामक वाद-विवादों में उलझ चुकी थीं, जैन तर्कशास्त्र अपनी सीमाओं में आत्मकेंद्रित हो रहा था, और वैदिक परंपरा स्वयं अनेक खंडों में विभाजित होकर अपनी एकता को भूल बैठी थी। ऐसे में उन्होंने भारतीय धर्म, अध्यात्म और दर्शन को नई चेतना से भरने के लिए सम्पूर्ण भारत की पदयात्रा की और देश के चार कोनों पर मठों की स्थापना कर सांस्कृतिक एकता का शंखनाद किया। उन्होंने कई ग्रंथ रचे और इस राष्ट्र की छिन्न-भिन्न आत्मा को गौरवबोध दिया। इस प्रकार वह सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और भौगोलिक सभी स्तरों पर आधुनिक अर्थों में भारतीय एकता का सूत्रपात करने वाले पहले ऋषि थे। उनका अद्वैत वेदांत दर्शन का अमृत भारत की अनंत स्मृतियों में संचित है।

आचार्य शंकर का मध्यप्रदेश से गहरा नाता रहा है। माँ नर्मदा की अमृत धारा से अभिसिंचित यह पुण्यधरा आचार्य शंकर की ज्ञान भूमि है। बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक ओम्कारेश्वर वह स्थान है, जहाँ से भारत की आध्यात्मिक एकता की आधुनिक यात्रा प्रारंभ हुई थी। जहाँ एक आठ वर्षीय बालक ने गुरु के चरणों में बैठकर समस्त ब्रह्मांड के एकत्व का रहस्य समझा था, और भारत को पुनः एक सूत्र में पिरो दिया। आज इस पुण्यभूमि से अद्वैत की अद्वितीय गूँज पुनः विश्व को नई दिशा दे रही है। ‘एकात्म धाम’ प्रकल्प इसी गूँज की प्रतिध्वनि है, जो भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को पुनः सशक्त करने का संकल्प लिए हुए है। यहाँ स्थापित आदि शंकराचार्य जी की 108 फीट ऊँची विशाल प्रतिमा भारत के सांस्कृतिक उद्घोष का पर्याय है।

मध्यप्रदेश की यह पावन धरा आज न केवल भारत के लिए बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए अद्वैत दर्शन की प्रयोगशाला बनकर उभर रही है। जब दुनिया संघर्ष और विभाजन के दौर से गुजर रही है, तब नर्मदा के तट से उठने वाला यह एकात्मता का स्वर मानवता को शांति और सह-अस्तित्व का नया मार्ग दिखा रहा है। यह प्रकल्प मध्यप्रदेश को वैश्विक पटल पर आध्यात्मिक चेतना के एक ऐसे केंद्र के रूप में स्थापित कर रहा है, जहाँ प्राचीन ज्ञान और आधुनिक शोध का अद्भुत संगम होगा। इस धाम की सार्थकता इसके बहुआयामी स्वरूप में निहित है, जो दर्शन को पुस्तकीय ज्ञान से निकालकर प्रत्यक्ष अनुभूति में बदल देता है। यहाँ विकसित हो रहा ‘अद्वैत लोक’ संग्रहालय आधुनिक तकनीक जैसे 3डी होलोग्राम और इमर्सिव प्रोजेक्शन के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों को शंकराचार्य के जीवन और उनके सिद्धांतों से रूबरू कराएगा। इसके साथ ही, यहाँ स्थापित होने वाला ‘आचार्य शंकर अंतर्राष्ट्रीय अद्वैत वेदांत संस्थान’ दर्शन, विज्ञान और कला के अंतर्संबंधों पर शोध का केंद्र बनेगा, जिससे जटिल वैश्विक समस्याओं का समाधान वेदान्त की दृष्टि से संभव हो सकेगा। यह संस्थान विद्यार्थियों को वेदों के साथ आधुनिक शिक्षा प्रदान कर ऐसे ‘शंकर दूत’ तैयार करेगा, जो समाज में समरसता और ज्ञान का प्रकाश फैलाएंगे।

एकात्म धाम का यह प्रकल्प वास्तव में एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण है, जिसमें समाज की व्यापक भागीदारी इसे एक जन-आंदोलन का स्वरूप देती है। यह धाम स्थानीय स्तर पर आर्थिक समृद्धि के नए द्वार खोल रहा है, जहाँ हस्तशिल्प, पर्यटन और रोजगार के माध्यम से हजारों परिवारों का जीवन स्तर ऊँचा उठेगा। ओंकारेश्वर की इस ज्ञान-भूमि से प्रस्फुटित होने वाली यह चेतना आने वाली शताब्दियों के लिए भारत के सांस्कृतिक गौरव को अक्षुण्ण रखेगी। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना को चरितार्थ करता यह प्रकल्प न केवल मध्यप्रदेश को अद्वैत का वैश्विक केंद्र बनाएगा, बल्कि संपूर्ण विश्व विश्व मानवता को शाश्वत शांति का दिग्दर्शन कराएगा।

  • पुरु शर्मा
    शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय

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