प्रकृति की चेतावनी को समझिए

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सावधान हो जाइए! सोमवार को इंदौर और पूरे मालवा अंचल ने प्रकृति का जो तांडव देखा, वह कोई सामान्य मौसम परिवर्तन की घटना नहीं, बल्कि हमारे विनाश की पहली दस्तक है। 90 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की रफ़्तार से आई आंधी, आसमान को निगलते धूल के गुबार और कड़कती बिजली ने महज़ कुछ मिनटों में विकास के दावों की धज्जियां उड़ा दीं। मानव के गरूर को मिट्टी में मिला दिया।
धराशायी होते पेड़, ठप पड़ी बिजली और थम चुकी सड़कों ने यह साफ़ कर दिया कि जिसे हम ‘महानगर का विकास और गौरव’ कहते हैं, वह प्रकृति के एक मामूली झटके के सामने कितना बौना और लाचार है।
अगर हम अब भी इसे एक साधारण आंधी मानकर गलफत की चादर तान सो रहे हैं, तो हम अपने जीवन की सबसे भयानक भूल कर रहे हैं। यह तूफ़ान प्रकृति का मौन संवाद नहीं, बल्कि कान के पर्दे फाड़ देने वाली वह अंतिम चेतावनी है, जिसे यदि अब भी नहीं सुना गया, तो परिणाम बेहद भयावह होंगे।

मानव ने विज्ञान, तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अहंकार में चूर होकर खुद को भगवान समझ लिया है। हमने आसमान को नापा, समुद्र को चीरा और अपनी सुख-सुविधाओं का एक आलीशान साम्राज्य खड़ा कर लिया। लेकिन सोमवार के कुछ घंटों के बवंडर ने हमारे इस झूठे अभिमान को मिट्टी में मिला दिया। जिस बिजली और इंटरनेट पर हमारी पूरी ज़िंदगी टिकी है, वह पल भर में गायब हो गई। जिन सड़कों पर हमारी रफ्तार का घमंड दौड़ता है, वे मलबे के ढेर में तब्दील हो गईं। यह प्रकृति का शक्ति-प्रदर्शन नहीं था, बल्कि हमारी औकात का अहसास कराने वाला एक कड़ा तमाचा था।

दिक्कत मौसम के बिगड़ने की नहीं है, बल्कि मनुष्य की उस घटिया सोच की है जिसके तहत वह खुद को प्रकृति का मालिक समझने लगा है। वास्तविकता यह है कि हम प्रकृति के मालिक नहीं, बल्कि उसके रहमों-करम पर जीने वाले एक छोटे से अंश हैं।
पिछले कुछ दशकों में हमने विकास के नाम पर प्रकृति का बेरहमी से कत्लेआम किया है:
पेड़ों को ज़मीन घेरने वाली रुकावट मानकर काट फेंका गया।नदियों और तालाबों को कचरा डालने का साधन बना दिया गया।
लालच में आकर हवा और मिट्टी को ज़हर से भर दिया गया।
हम इतने स्वार्थी हो चुके हैं कि अनुकूल मौसम में प्रकृति को भूल जाते हैं और जब वह अपना संतुलन ठीक करने के लिए करवट लेती है, तो हम छाती पीटकर उसे ‘आपदा’ कहने लगते हैं। इतिहास गवाह है कि जिसने भी प्रकृति से युद्ध लड़ा है, उसका नामोनिशान मिट गया।
अब भी नहीं संभले, तो अंत निश्चित है…
इंदौर का यह तूफ़ान हमारे लिए खतरे का सायरन है। विकास का मतलब गगनचुंबी इमारतें नहीं, बल्कि सांस लेने के लिए शुद्ध हवा और जीने के लिए सुरक्षित पर्यावरण है। पेड़ों को सजावट का सामान समझना बंद कीजिए, वे हमारे जीवनदाता हैं।
सोमवार का वह भयानक तूफ़ान थम चुका है, सड़कें साफ़ हो गई हैं और बिजली भी लौट आई है। लेकिन अगर हम इस चेतावनी को भूलकर फिर से उसी ढर्रे पर लौट गए, तो याद रखिए, अगला तूफ़ान इससे कहीं ज्यादा भयानक होगा। प्रकृति आज अंतिम बार कह रही है: “मेरी गोद में रहो, मेरे मालिक बनने की कोशिश मत करो। अगर मेरे नियमों को तोड़ोगे, तो एक तबाही ही काफी होगी यह बताने के लिए कि इस ब्रह्मांड की सर्वोच्च शक्ति केवल मैं हूँ!

(गत गुरुवार को भोपाल में भी यही दृश्य देखने को मिला,जब थोड़ी देर चली देर तेज हवाओं ने शहर के जनजीवन को अस्त व्यस्त कर दिया)

राजकुमार जैन (स्वतंत्र लेखक)

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