नीट पेपर लीक के खिलाफ उपजे जेन ज़ी के प्रभावी आंदोलन और युवाओं के दबाव के बाद अंतत: केन्द्रीय शिक्षा मंत्री डॉ धर्मेंद्र प्रधान का पद से इस्तीफा पहाड़-सी सत्ता के आगे निरीह काॅकरोचों की शानदार जीत है। इस कामयाबी, एकजुटता और धैर्य ने दिखा दिया कि जेन ज़ी केवल सोशल मीडिया और स्मार्ट फोन में डूबी जनरेशन भर नहीं है, वक्त आने पर वह हिमालय को झुकाने की भी ताकत रखती है। कोई इसे हल्के में न ले। दिल्ली के जंतर मंतर पर करीब महीना भर चले इस अलग किस्म के आंदोलन ने देश के राजनीतिक आकाश में अभिजीत दिपके नामक नए सितारे को उगा दिया है। इस आंदोलन में शामिल युवाओं के तौर-तरीके पर आपत्ति हो सकती है, लेकिन उन्होंने यह तो साबित कर दिया कि अगर देश में किसी ने युवा शक्ति (खासकर वो युवा जो 15 साल से 30 साल के दर्मियान के हैं) को कम आंका तो उसके राजनीतिक अरमानों पर भी पानी फिर सकता है। हालांकि यह इस्तीफा भी मजबूरी में ही सही, सरकार की संवेदनशीलता को दिखाता है। खास बात यह है कि किसी जनआंदोलन के दबाव में मोदी सरकार के किसी मंत्री का यह पहला इस्तीफा है। इसके पूर्व सरकार ने किसानों आंदोलन के बाद तीन विवादित कृषि कानून वापस लिए थे, लेकिन तब भी इस्तीफा किसी का नहीं हुआ था।
दरअसल पेपर लीक मामले को मोदी सरकार ने शुरू से जिस तरह से हैंडल किया, वह सही नहीं था। क्योंकि यह आम भ्रष्टाचार जैसा मामला नहीं था। लाखों युवाओं के भविष्य की आकांक्षाओं से जुड़ा मामला था। नीट से पहले भी इस देश में विभिन्न परीक्षाओं के पेपर लीक होते रहे हैं, जिससे देश की दुनिया भर में बदनामी हुई है। लेकिन नीट पेपर लीक और उसके बाद हताशा में करीब डेढ़ दर्जन परीक्षार्थियों की आत्महत्या ने समूचे देश को झकझोर रख दिया और नीट पेपरलीक कांड ने परीक्षा तंत्र में फैले भ्रष्टाचार को भी बेनकाब कर दिया। अगर उसी वक्त घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेकर धर्मेन्द्र प्रधान पद त्याग देते और सरकार से समूचे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग करते तो न केवल मंत्री प्रधान बल्कि प्रधानमंत्री की नाक भी ऊंची रहती। लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ। सरकार के इस रवैये से युवाओं का व्यवस्था पर शक गहराता गया। हालांकि सरकार ने परीक्षा व्यवस्था सुधारने और अपराधियों को पकड़ने के कुछ उपाय किए, लेकिन इससे जो सकारात्मक संदेश जाना था, वो नहीं गया। नतीजतन जो आंदोलन दिपके ने व्यंग्यात्मक रूप से सोशल मीडिया पर शुरू किया था, वो हकीकत में एक बड़े युवा समाज का आंदोलन बन गया। आम युवा में यह भावना घर कर गई कि इस देश में पैसे की ताकत और भ्रष्ट व्यवस्था के आगे उसकी सारी मेहनत बेकार है। अगर वो अभी भी सड़कों पर नहीं उतरा तो उसका भविष्य अंधकारमय है। यानी यह आर-पार की लड़ाई है। यही कारण है आंदोलन को बदनाम करने की कोशिशों और इसके औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लगाए जाने के बावजूद बड़ी संख्या लड़के-लड़कियां आंदोलन में शामिल होने पहुंचे। लाठियां भी खाईं। युवाओं के तेवर देख इसे राजनीतिक दलों ने भी समर्थन दिया। इसी हल्ले में कुछ आपराधिक तत्व भी शामिल हो गए और आंदोलन को हिंसक बनाने की कोशिश की। सुरक्षाकर्मियों पर हमले किए।
इस आंदोलन को काकरोच जनता पार्टी ने शुरू किया। पर्यावरणविद एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने युवाओं के समर्थन में जंतर मंतर पर आमरण अनशन कर आंदोलन को नैतिक बल दिया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और विपक्ष ने देर से ही सही, आंदोलन को खुलकर समर्थन दिया। उधर सरकार ने सोनम के स्वास्थ्य का हवाला देकर उन्हें अस्पताल में भर्ती करा दिया तो अनशन का जिम्मा अभिजीत दिपके ने संभाला। सरकार की परेशानी यह थी कि वह युवाओं के इस विरोध को दूसरे राजनीतिक अथवा गैर राजनीतिक संगठनों की तरह ‘डील’ नहीं कर सकती थी। आंदोलन को लेकर उसके रूख में अहंभाव भी था और कुछ हद तक असमंजस भी। क्योंकि युवाओं की नाराजी से आगामी चुनावों में भारी सियासी नुकसान होने का अंदेशा था। उसने शुरू में युवाओं की ताकत और संकल्प शक्ति को कम आंका। लेकिन जब कोई दूसरा रास्ता नहीं दिखा तो आंदोलनकारियों की मुख्य मांग प्रधान के इस्तीफे को मान लिया। एक और डर इस आंदोलन के देशव्यापी होने का भी था। बिहार, यूपी और महाराष्ट्र में काॅकरोचों ने रंग दिखाना शुरू कर दिया था। उधर अभिजीत दिपके ने कहा कि हमने सरकार को झुका दिया है। अभी तो यह पहला विकेट है। आगे और भी गिरेंगे। यह जीत युवाओं की एकता की जीत है। दिपके आगे क्या करेंगे, यह अभी देखने की बात है। क्या उनकी ‘काॅकरोच जनता पार्टी’ किसी राजनीतिक पार्टी में तब्दील होकर चुनावी राजनीति भी करेगी या फिर वो केवल युवाओं के मुद्दे उठाने का माध्यम बनी रहेगी, यह आगे तय होगा। लेकिन एक शुरूआत युवाओं की आत्मशक्ति के साक्षात्कार की हो चुकी है, इसमें संदेह नहीं। इस मुद्दे पर अभी और भी राजनीति होगी, सब इस चूल्हे पर अपनी अपनी रोटियां सेकेंगे। लेकिन यह आंदोलन एक सबक भी दे रहा है। सरकार के लिए सबक यह है कि उसे ज्यादा लोकतांत्रिक और संवेदनशील होना पड़ेगा। हर जनआंदोलन सरकार के खिलाफ षड्यंत्र नहीं होता। अगर मोदी सरकार शुरू में ही आंदोलनकारियों से संवाद करती तो शायद प्रधान के इ्स्तीफे की नौबत भी नहीं आती। दूसरे, प्रतियोगी और प्रवेश परीक्षाओं की फुलप्रूफ और विश्वसनीय व्यवस्था बनानी होगी। एनटीए जैसी इतनी बड़ी परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था में अधिकांश काम संविदाकर्मियों के भरोसे चल रहा था, यह बात ही अपने आप में चौंकाने वाली और अगंभीरता की द्योतक है। विपक्ष के लिए सबक यह है कि उसे खुद अपने मुद्दे उठाना और जनता से जुड़ना सीखना होगा। उधार का सिंदूर मांग में भरने से राजनीतिक सुहाग ज्यादा नहीं टिकता। काॅकरोचों को साथ लेना है तो उनके जैसी जीवटता भी दिखानी होगी।
हालांकि अभिजीत जेन ज़ी की वय मर्यादा से थोड़े से बड़े हैं, लेकिन जिस तरह उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए पहले युवाअों की वर्च्युअल और बाद में एक्चुअल फौज जुटाई और अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगे मनवाईं, उसने देश में भावी आंदोलनों की दिशा भी तय कर दी है।

*अजय बोकिल
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

