हिन्दी-जीवनव्रती श्री कैलाशचन्द्र पंत को वर्ष 2026 के पद्मश्री अलंकरण से विभूषित किया गया है। 25 जनवरी, 2026 को जब अलंकरण की घोषणा हुई, तब समूचे मध्यप्रदेश में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। सबको एहसास हुआ कि सर्वथा सुपात्र समाजसेवी की सुदीर्घ साधना को सम्मानित किया गया है। यह भी प्रतिक्रिया हुई कि सम्मान में विलंब हुआ। बहरहाल, देर आयद, दुरुस्त आयद।
जीवन के 90 बसंत देख चुके श्री कैलाशचन्द्र पंत ने मध्यप्रदेश में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के ध्वज तले सेवा भावना का जो दृष्टांत प्रस्तुत किया है, उसका सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है लोकसंग्रह। दूसरा उल्लेखनीय तथ्य है कि हिन्दी सेवा के लिए दादा कैलाशचन्द्र पंत ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व अंतर्निहित तीन बड़ी संभावनाओं का लगभग परित्याग कर दिया। साठ के दशक में मेधावी छात्र के रूप में स्नातकोत्तर उपाधि अर्जित करने वाले पंत जी, किसी भी विश्वविद्यालय अथवा महाविद्यालय में सफल प्राध्यापक हो सकते थे। उनकी संवाद शैली का अनुभव करने वाला प्रत्येक व्यक्ति स्वीकार करेगा कि वे विद्यार्थियों के बीच बहुत लोकप्रिय भी होते। श्री कैलाशचन्द्र पंत में एक अच्छा संपादक होने की असीम संभावना थी। उनकी भाषा और शैली, तथ्य-निरूपण और कथ्य-कला पंत जी को पत्रकार जगत में प्रतिष्ठित करने में समर्थ होती। उनका लिखा हुआ गद्य जिन्होंने भी पढ़ा है वे निस्संकोच स्वीकार करेंगे कि श्री कैलाशचन्द्र पंत हिन्दी के समर्थ निबंधकार होते। निश्चित ही, इन तीनों में से जिस भी विधा को वे अपना कर्मपथ चुनते, उसी में शिखर तक पहुँचते। किंतु यह उनकी वैयक्तिक उपलब्धि होती। पंत जी ने अपने व्यष्ठि के स्थान पर समष्ठि को वरीयता दी। यह उनके चरित्र की असाधारण विशेषता है। उन्होंने आजीवन हिन्दी सेवा का व्रत लिया। इस व्रत का परिपालन करने में दादा का जो गुण आधारभूत सिद्ध हुआ, वह है लोकसंग्रह की उनकी उदात्त प्रकृति। इसी गुण के कारण वे अपने चहुओर और दूर-दूर तक एक वृहद परिवार रच सके।
जब शिक्षा आधुनिक और प्रगतिशील नहीं हुई थी, तब स्कूल में पढ़ा था- “तरुवर फल नहिं खात हैं, सरुवर पियहिं न पान” अर्थात् वृक्ष अपने फल खुद नहीं खाते (दूसरों को खाने के लिए फल देते हैं), सरोवर (जल स्रोत) स्वयं अपना पानी नहीं पीते अर्थात् उनमें प्रवहमान और संचित जल दूसरों की प्यास बुझाने के लिए होता है। इसीलिए सरिताएँ, सरोवर और वृक्ष देवतुल्य और पूज्य माने गए हैं। मानव जीवन में भी कतिपय ऐसे सज्जन होते हैं जो अपने आचार-विचार और व्यवहार से समस्त समाज के हो जाते हैं। उनके सोच के दायरे में सबका कल्याण समाहित होता है। ऐसे व्यक्ति विरले भले ही हों, लेकिन होते अवश्य हैं। भोपाल के सांस्कृतिक परिदृश्य में ऐसा ही एक नाम दादा कैलाशचन्द्र पंत का है। वे अजातशत्रु हैं और सर्व स्वीकार्य भी। इसीलिए सब उनके हैं और वे सबके हैं।
मेरा भोपाल आना 6 नवम्बर 1974 को हुआ। उसी साल जुलाई में मारवाड़ी रोड के 121 नम्बर मकान से दैनिक ‘देशबन्धु’ का प्रकाशन श्री मायाराम सुरजन ने आरम्भ किया था, जिसमें उपसम्पादक के पद पर मेरी नियुक्ति हुई थी। इसी के बाजू वाले मकान में श्री कैलाशचन्द्र पंत का मुद्रण मन्दिर प्रेस था। सन् 1976 में उनके अनुज श्री किशन पंत मध्यप्रदेश युवक कांग्रेस के महामंत्री होकर भोपाल आए और पहले से मित्र मध्यप्रदेश युवक कांग्रेस के अध्यक्ष श्री रामेश्वर नीखरा के कारण मेरे अनन्य मित्र बने और आजीवन पारिवारिक अन्तरंगता के रिश्ते में बंध गए। उन्हीं के कारण श्री कैलाशचन्द्र पंत न केवल अग्रज बल्कि मनसा-वाचा-कर्मणा मेरे परिवार के अभिभावक बने और पूरी तरह उस दायित्व का निर्वाह भी कर रहे हैं। वे हमारे परिवार के पूज्य दादा हैं।
सन् 1976 में मध्यप्रदेश के आंचलिक पत्रकारों को समवेत मंच प्रदान करने के लिए मध्यप्रदेश आंचलिक पत्रकार संघ का गठन करने की मेरी पहल के पीछे किशन भाई का समर्थन महत्त्वपूर्ण था, वहीं आरम्भिक तैयारियों के लिए सहायता का संबल कैलाश दादा ने ही प्रदान किया। संघ की स्टेशनरी की छपाई मुद्रण मन्दिर ने की, अटलराम धर्मशाला में स्थापना सम्मेलन का प्रबन्ध किशन भाई ने किया और प्रदेश भर से बड़ी संख्या में आए आंचलिक पत्रकारों के भोजन चाय-नाश्ता का इन्तजाम नीखरा जी ने किया। उन दिनों इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का जमाना नहीं आया था। अखबार और पत्रिकाएँ भी गिने-चुने थे। लेकिन जितने भी थे उनकी प्रतिष्ठा और प्रभाव बड़ा था क्योंकि उनके लिखे पर पाठकों का विश्वास था। आमतौर पर यह जुमला सुनने को मिलता था कि फलाँ अखबार में छपा है, इसलिए सच होगा। अखबार भी तरह-तरह के थे। लेकिन गाँवों, कस्बों और छोटे नगरों में इन अखबारों के साथ जुड़े पत्रकारों ने (जो बहुधा खबर लिखने, अखबार की एजेन्सी चलाने और अखबारों के लिए विज्ञापन जुटाने आदि सभी काम कर लेते थे), आपसी समझ और सद्भावना, रिश्तों में पारिवारिकता और सहयोग की भावना हुआ करती थी। प्रतिस्पर्धा तो तब भी थी परन्तु वह प्रतिद्वंद्विता नहीं थी। उनमें से बहुत कम लोग साधन सम्पन्न थे लेकिन समाज की नजरों में उनकी प्रतिष्ठा और कद्र किसी से कम नहीं थी। परन्तु मध्यप्रदेश आंचलिक पत्रकार संघ की स्थापना से पहले उनके कार्य स्थल से बाहर उनका कोई दायरा नहीं था। उन्हें अच्छी पत्रकारिता की शिक्षा-दीक्षा के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों और सहायक साहित्य की जरूरत थी। मध्यप्रदेश आंचलिक पत्रकार संघ के इन उद्देश्यों, कार्यक्रमों और सांगठनिक स्वरूप के निर्धारण में दादा कैलाशचन्द्र पंत के मार्गदर्शन की बड़ी भूमिका रही। इसमें कतई अतिशयोक्ति नहीं है कि संस्था संगठन के मामले में मेरी समझ का परिष्कार दादा कैलाशचन्द्र पंत ने ही किया। हम जिन्हें बुलाते हैं उनका कैसे ध्यान रखना चाहिए, जिस उद्देश्य से बुलाते हैं उसकी पूर्व से सूचना देनी चाहिए, बैठकों-सम्मेलनों की कार्यवाहियाँ किस तरह संचालित की जानी चाहिए, इस सबकी समझाइश समय-समय पर दादा ही देते रहे।
दादा के परिवार में घुले-मिले इन 50 सालों में उनके बहुविध स्वरूपों का साक्षात्कार हुआ। सन् 1977 में दादा कैलाशचन्द्र पंत ने साप्ताहिक’ जनधर्म’ का सम्पादन-प्रकाशन आरम्भ किया। ‘जनधर्म’ के कई विशेषांक उन्होंने निकाले, जो सन्दर्भ की दृष्टि से स्थाई महत्त्व के हैं। ‘जनधर्म’ के पृष्ठों में बड़ी घटनाओं पर समीक्षात्मक रिपोर्ट, तथ्य और तर्कों से युक्त वैचारिक सम्पादकीय टिप्पणी, स्तरीय साहित्यिक रचनाएँ, कोई एक विस्तृत विशेष रिपोर्ट और प्रसार क्षेत्र के समाचार दिए जाते थे। ‘दिव्यचक्षु’ के उपनाम से दादा की व्यंग्य रचना ‘जनधर्म’ के अन्तिम पृष्ठ पर दी जाती थी और पाठक वहीं से अखबार पढ़ना शुरू करते थे। ‘जनधर्म’ ने मध्यप्रदेश के किसी श्रेष्ठ साहित्यकार को प्रतिवर्ष ‘सारस्वत सम्मान’ से अलंकृत करने की परम्परा आरम्भ की थी। यह कैलाश दादा की सात्विक सोच का प्रेरक उदाहरण है। ‘जनधर्म’ दादा के लिए आमदनी का जरिया नहीं था, बल्कि जब तक उसका प्रकाशन हुआ कोई न कोई वयोवृद्ध अथवा सेवानिवृत्त कलमकार सहयोगी के रूप में जुड़ा रहा, जिन्हें सम्मान के साथ-साथ मानदेय प्रदान करने में दादा ने कसर नहीं रखी।
भोपाल में कभी-कभार ऐसे विवाद उठते रहे हैं जिनसे साम्प्रदायिक सद्भावना और सामाजिक समरसता पर आँच आती है। सन् 1992 का दंगा तो दुर्भाग्यपूर्ण और कलंककारी रहा ही, बीच में भी छुटपुट ऐसे अवसर आए जब लगा कि साम्प्रदायिकता की आग भड़क सकती है। भारतीय संस्कारों के प्रति दृढ़ आग्रही… परन्तु साम्प्रदायिक सोच से सर्वथा परे… दादा कैलाशचन्द्र पंत ने हिन्दू एकता मंच या अन्य मंचों पर सनातन पक्ष पूरी दृढ़ता और मुखरता से रखा, लेकिन सदैव यह प्रयास रखा कि भोपाल की फिजा खराब न हो।
2 और 3 दिसम्बर, 1984 की दरमियानी रात भोपाल में यूनियन कार्बाइड फैक्टरी से रिसी जहरीली गैस ने सैकड़ों लोगों की जान ली और हजारों को जीवन भर के लिए बीमार और लाचार बना दिया। उस भीषण दौर में भोपालवासियों ने जहाँ सेवा भावना का उज्ज्वल पक्ष प्रस्तुत किया, सरकारी पक्ष ने राहत और पुनर्वास के साथ-साथ जघन्य अपराधियों की रक्षा का प्रपंच रचा, दुनिया भर के तथाकथित विधि सहायकों ने बेबस गैस पीड़ितों की लूट का षड्यंत्र करने की कोशिशें की, गैस पीड़ितों की मदद और उनके हकों का संघर्ष करने के लिए अच्छे लोग भी सामने आए, वहीं दादा कैलाशंचन्द्र पंत ने भोपाल के पर्यावरण को शुद्ध करने के लिए यज्ञ का आयोजन किया। यह प्रकट तथ्य है कि भारतीय ऋषि मनीषा ने आदिकाल से युद्धों के महाविनाश के बाद यज्ञों का विधान किया था। इन यज्ञों के हवन कुण्डों में पर्यावरण को शुद्ध करने वाली सामग्री डाली जाती थी और उसका सकारात्मक प्रभाव भी होता है। साथ ही, यज्ञ में उच्चारित मंत्रों की अनुगूँज भी वायुमण्डल में होती है। इस सबसे अलग, आस्था का संबल मिलता है। यह कैलाश दादा का ही बूता था कि जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती के सान्निध्य में यह यज्ञ सम्पन्न हुआ।
दादा कैलाशचन्द्र पंत ‘नवभारत’, ‘इन्दौर समाचार’ अखबारों से जुड़े रहे हैं। भारत कृषक समाज की मध्यप्रदेश इकाई के महत्त्वपूर्ण स्तम्भ रहे हैं और उसके मुखपत्र का सम्पादन भी उन्होंने किया है। भारत कृषक समाज मध्यप्रदेश के भवन निर्माण के पीछे दादा की ही श्रम-साधना फलीभूत हुई। पंतजी समाचार पत्र-पत्रिकाओं में साहित्यिक-सांस्कृतिक और समसामयिक ज्वलन्त मुद्दों पर बेवाक टिप्पणियाँ लिखते रहे हैं। स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती पर जब हमने दादा माखनलाल चतुर्वेदी के ‘कर्मवीर’ का पुनः प्रकाशन किया तब दादा का स्थायी स्तम्भ ‘दूसरा पहलू’ उसके चर्चित होने का एक आधार था। बड़े नामधारी स्तम्भकारों की तुलना में पंत जी के विश्लेषण अधिक प्रामाणिक रहते हैं।
अपने गुरु श्री बैजनाथप्रसाद दुबे के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में दादा कैलाशचन्द्र पंत ने मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिन्दी भवन भोपाल, रविशंकर शुक्ल पुस्तकालय भोपाल के मंत्री- संचालक का दायित्व जिस लगन, कल्पनाशीलता और समर्पण के साथ निभाया है, उसने हिन्दी भवन को हिन्दी और संस्कृति विषयक गतिविधियों में देश की अग्रणी संस्थाओं में से एक के रूप में प्रतिष्ठित किया है। हिन्दी भवन में सुसज्जित साहित्यकार निवास दादा की कल्पना के कारण साकार हो सका। हिन्दी भवन और राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की ओर से पावस, शरद और बसंत व्याख्यानमालाओं का आयोजन राष्ट्रीय चर्चा का विषय है। इनमें देशभर के लब्ध प्रतिष्ठ विचारकों और रचनाकारों की भागीदारी होती है। मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति से हिन्दी की महत्त्वपूर्ण और उत्कृष्ट मासिक पत्रिका ‘अक्षरा’ का प्रकाशन 1982 से हो रहा है। इसके प्रधान सम्पादक का दायित्व दीर्घकाल तक दादा कैलाशचन्द्र पंत ने निभाया। संप्रति डा. विकास दवे ‘अक्षरा’ के प्रधान संपादक हैं।
19 जून 1984 को माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान, भोपाल की स्थापना की तैयारी से लेकर आज 42 साल पूरे होने तक पंतजी का परामर्श मिलता रहा है। जहाँ उन्हें कमी या कसर नजर आई, उन्होंने अधिकारपूर्वक टोका और सही दिशा की समझाइश दी। दादा कैलाशचन्द्र पंत की सुदीर्घ पत्रकारीय सेवाओं का सम्मान करते हुए माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान, भोपाल ने 18 जून 2006 को उन्हें ‘लाल बलदेवसिंह सम्मान’ से अलंकृत किया।
26 अप्रैल 2026 को दादा कैलाशचन्द्र पंत ने अपने यशस्वी जीवन के 90 वर्ष पूरे कर लिए हैं। उनका कृतित्व समाज की थाती है और इसीलिए समाज के सभी पक्षों की प्रतिनिधि संस्थाओं ने निश्चय किया कि दादा का अमृत महोत्सव भव्यता और गरिमा के साथ मनाया जाए। दादा की जन्मभूमि महू से उनके पचहत्तरवें जन्मदिन, 26 अप्रैल 2010 को अमृत महोत्सव के आयोजन की राष्ट्रव्यापी श्रृंखला आरम्भ हुई। दिल्ली, वर्धा, श्रीधाम झोंतेश्वर, रायपुर, इन्दौर और भोपाल में समसामयिक सन्दर्भों पर गम्भीर विमर्श के साथ दादा का आत्मीय अभिनन्दन किया गया।
जनसंपर्क विभाग, मध्यप्रदेश शासन ने श्री कैलाशचन्द्र पंत को ‘गणेशशंकर विद्यार्थी ‘ सम्मान से पुरस्कृत किया। विश्व हिन्दी सम्मेलन में दादा को ‘हिन्दी सेवी सम्मान’ प्रदान किया गया। केन्द्रीय हिन्दी सेवी संस्थान का ‘सुब्रमण्यम् भारतीय सम्मान’ और शताब्दी वर्ष समारोह में ‘कर्मवीर सम्मान’ से उन्हें सम्मानित किया गया। जीवन के नौ दशक पूरे होने पर भोपाल में लोक सम्मान के अवसर पर उन्हें 2, 51, 000/- की सम्माननिधि समर्पित की गई। यहाँ यह उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि पंत जी ने अपने सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में साहित्य, पत्रकारिता और वक्तृता के धनी डा. विकास दवे का चयन किया है। हिन्दी भवन के मंत्री-संचालक के रूप में उन्होंने कार्यभार संभाल लिया है। तुलसी मानस प्रतिष्ठान के कार्यकारी अध्यक्ष श्री रघुनंदन शर्मा, हिन्दी भवन में भी कार्यकारी अध्यक्ष की भूमिका में हैं। शर्मा-दवे की यह जोड़ी हिन्दी भवन की गतिविधियों और स्वरूप को नया रूपाकार देने में जुटी हुई है। एक श्रेयस्कर पहल करते हुए दोनों ने हिन्दी भवन के सभागार का नामकरण ‘पद्मश्री कैलाशचन्द्र पंत सभाभवन’ कर दिया है।
लोकसंग्रह की बात से यह लेख आरंभ हुआ। निश्चय ही दादा कैलाशचन्द्र पंत जैसा विशाल स्नेही परिवार मध्यप्रदेश में कोई और नहीं रच पाया। इसी का प्रतिफल है कि समाज ने पंत जी को मान-सम्मान और अपनापन देने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। परम पिता से प्रार्थना है कि दादा शतायु हों और उनका मार्गदर्शन सुलभ बना रहे।

विजयदत्त श्रीधर
-संस्थापक, ज्ञानतीर्थ सप्रे संग्रहालय
मो. 7999460151, 9425011467
ईमेल : sapresangrahalaya@yahoo.com

