भारतीय संस्कृति और वांग्मय में ‘गुरु’ कोई पद, वेतनभोगी व्यवस्था या आजीविका का साधन मात्र नहीं था। वह चेतना का एक ऐसा जाग्रत आयाम था, जिसका कार्य मनुष्य के भीतर सोई हुई दिव्यता को जगाना था। ‘गु’ का अर्थ अंधकार और ‘रु’ का अर्थ प्रकाश—अर्थात जो अज्ञान के तिमिर को चीरकर बोध के परम प्रकाश की ओर ले जाए, वही गुरु था। प्राचीन गुरुकुलों में गुरु और शिष्य का संबंध किसी आर्थिक अनुबंध या प्रशासनिक नियमावली से नहीं बंधा था। वह आत्मा से आत्मा का, संस्कार से संस्कार का और दृष्टि से दृष्टि का मिलन था। वहाँ जीवन जीने की कला सिखाई जाती थी, जहाँ ज्ञान केवल आजीविका की सीढ़ी न होकर चरित्र-निर्माण और सत्य के साक्षात्कार का माध्यम बनता था।
किंतु कालखंड बदला, सभ्यता बदली और औपनिवेशिक दासता की कोख से निकली आधुनिक शिक्षा प्रणाली ने समाज की धमनियों में अपनी जड़ें जमा लीं। इस बदलाव की आंधी में सबसे पहली आहुति गुरु की गरिमा की लगी। गुरु सिमटकर ‘शिक्षक’ बन गया। ‘शिक्षक’ यानी वह जो केवल शिक्षा देता है, सूचनाएं बांटता है, निर्धारित पाठ्यक्रम के पन्नों को एक निश्चित समयावधि में समाप्त करता है और विद्यार्थी को परीक्षा की चौखट तक पहुँचा देता है। यहाँ ज्ञान का अर्थ संकुचित होकर केवल तथ्यों को कंठस्थ करने और परीक्षा में उगल देने तक सीमित हो गया। संबंध की जो पवित्र ऊष्मा थी, वह औपचारिक शिष्टाचार में बदल गई।
विडंबना यहीं समाप्त नहीं हुई। इक्कीसवीं सदी के आते-आते बाजारवाद और अनियंत्रित नौकरशाही के गठजोड़ ने शिक्षक की उस बची-खुची पहचान पर भी प्रहार कर दिया। आज का शिक्षक केवल शिक्षक भी नहीं बचा है; वह शासन की व्यवस्था का एक तुच्छ, निरीह और विवश ‘कर्मचारी’ मात्र बनकर रह गया है।
गुरु से शिक्षक और शिक्षक से एक कर्मचारी तक की यह अधो-यात्रा स्वतंत्र भारत के शैक्षिक परिदृश्य की सबसे बड़ी त्रासदी है। आज विद्यालयों में अध्ययन-अध्यापन की चिंता सबसे अंतिम पायदान पर धकेल दी गई है। शिक्षक से अपेक्षा यह नहीं की जाती कि वह किसी अबोध मन में जिज्ञासा की लौ जलाए, बल्कि उससे यह चाहा जाता है कि वह प्रपत्र भरे, ऑनलाइन हाजिरी की तकनीकों से अपनी भौतिक उपस्थिति का साक्ष्य दे, राशन और मध्याह्न भोजन के आंँकड़े जुटाए, मतदाता सूचियों के पन्ने पलटे और न जाने कितने गैर-शैक्षणिक दायित्वों की बेगार ढोए। खड़िया की जिस धूल को माथे पर लगाकर राष्ट्र के भाग्य का निर्माण होना था, वह धूल आज सरकारी दफ्तरों की फाइलों, ओएमआर शीट्स और निरर्थक विभागीय जांचों के दबाव में शिक्षक का दम घोंट रही है। जिस शिक्षक ने अपनी जवानी खपाकर पीढ़ियों को बोलना सिखाया, आज व्यवस्था उसी के अनुभव पर अविश्वास जताते हुए उसे अपनी पात्रता प्रमाणित करने के कठघरे में खड़ा कर देती है।
इस व्यवस्थागत पतन के बीच यह विचार करना अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि वर्तमान युग में शिक्षक की वास्तविक भूमिका क्या हो?
आज का युग सूचना विस्फोट का युग है। ज्ञान अब किसी एक व्यक्ति या संस्था के एकाधिकार में कैद नहीं है। आज के विद्यार्थी के पास स्मार्टफोन है, इंटरनेट का अथाह समंदर है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के ऐसे तंत्र हैं जो पलक झपकते ही किसी भी विषय पर जानकारी का अंबार लगा सकते हैं। ऐसी स्थिति में शिक्षक का परंपरागत स्वरूप स्वतः ही अप्रासंगिक हो जाता है। यदि शिक्षक केवल सूचना बांटने का काम करेगा, तो तकनीक उसे बहुत पीछे छोड़ देगी।
आज के समय में शिक्षक की भूमिका सूचना देने वाले की नहीं, बल्कि उस सूचना को ‘विवेक’ में बदलने वाले शिल्पी की है। तकनीक ज्ञान दे सकती है, परंतु संवेदना नहीं दे सकती। वह विश्लेषण दे सकती है, परंतु चरित्र नहीं गढ़ सकती। आज जब समाज में मूल्य तेजी से बिखर रहे हैं, मनुष्य मशीनीकृत हो रहा है और रिश्ते स्क्रीन की चमक में गुम हो रहे हैं, तब शिक्षक का दायित्व और भी गुरुतर हो जाता है। आज शिक्षक को पाठ्यक्रम से आगे बढ़कर यह सिखाना है कि सही और गलत के बीच का भेद क्या है, अहंकार और स्वाभिमान का अंतर क्या है, और सबसे बढ़कर यह कि सफल होने से पहले एक संवेदनशील मनुष्य कैसे बना जाए।
व्यवस्था चाहे शिक्षक को जितनी जंजीरों में जकड़ ले, उसे वेतनभोगी कर्मचारी की कतार में खड़ा कर दे, किंतु शिक्षक का मूल स्वभाव किसी शासनादेश का बंधक नहीं हो सकता। जब तक कक्षा की चौखट के भीतर शिक्षक और शिक्षार्थी के बीच का वह मानवीय संवाद जीवित है, तब तक उम्मीद बची हुई है। शिक्षक समाज को अपनी रीढ़ सीधी रखनी होगी और यह स्मरण रखना होगा कि राष्ट्र का पतन तब होता है जब उसका बौद्धिक वर्ग मौन साध लेता है।

सुशील शर्मा
(लेखक शिक्षा विभाग में लंबे समय तक कार्यरत रहे हैं। साहित्य के क्षेत्र में भी समान दखल रखते हैं।)


आज सरकार शिक्षक को चोर समझ रही है और उसकी उपस्थिति मोबाइल से जांच रही है।।