शरद ऋतु में आहार-विहार

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शरद पूर्णिमा से होली तक स्वास्थ्य की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ समय माना जाता है। आयुर्वेद की भाषा में यह विसर्ग काल का सबसे अच्छा समय है।
भगवान् कृष्ण ने भगवद गीता में अपने स्वरुप का वर्णन करते हुए कहा है कि “मासानां मार्गशीर्षोहं” अर्थात वर्ष के बारह मास में मैं मार्गशीर्ष मास अर्थात सबसे अच्छे स्वास्थ्य का महीना हूँ।
इस दौरान हमें भरपूर पोषक आहार लेना है। अपनी पाचन की योग्यता समझ कर पर्याप्त खाना है और शारीरिक आवश्यकता समझकर आवश्यक खाद्य पदार्थ लेना है।
परंतु शरद पूर्णिमा होते ही सब कुछ खाना शुरू करके सारे पथ्य बंद कर दें, ऐसा नहीं है।

शरद ऋतु 9 दिसंबर तक चलेगी। अतः 9 दिसंबर तक धीरे-धीरे भारी अथवा प्रोटीन युक्त आहार की मात्रा बढ़ाई जा सकती है। शरद ऋतु तक जिन वस्तुओं का निषेध है, उनमें से कुछ धीरे-धीरे प्रारंभ की जा सकती हैं। जैसे, शरद पूर्णिमा से दूध पीना शुरू करने की परंपरा है,
दीपावली से मिठाइयां खाना शुरू करने की परंपरा है, इत्यादि।
रसाहार केंद्रों में भी इन बातों का ध्यान रखकर दीपावली से ही शीशम, तुलसी बीज, कोकम बंद होंगे।
दीपावली से हरसिंगार, बेलपत्र, दिसंबर से अदरक, लेमन ग्रास अर्थात अगिया के रस शुरू होंगे
। आंवला नवमी के बाद ताजा आंवला शुरू होगा।
छठ पूजा के बाद कच्ची हल्दी शुरू होगी।
लाल गाजर आने के बाद गाजर चुकंदर शुरू होगा,। तीव्र पिप्पली चटनी, अरंडी का तेल आदि भी दे सकेंगे,। काढ़ा चूर्ण में डाली जाने वाली वस्तुएं बदली जाएंगी।
लहसुन, अजवाइन, मेथी, खजूर, दालचीनी, जावित्री तथा अन्य गर्म मसाले सरसों तेल जो शरद ऋतु में मना किए जाते थे वह अब धीरे-धीरे शुरू होंगे।

इसी प्रकार 9 दिसंबर के बाद सप्ताह में एक बार सिर धोना पर्याप्त होगा। सिर में बालों की जड़ों पर अच्छे से तेल मालिश करना चाहिए।
शरीर से पसीना बहाने के कार्य अधिक करने चाहिए; इसलिए दीपावली के बाद बागवानी, खेती आदि के मेहनत के काम, जिम, सूर्य नमस्कार, दौड़ना, खेलना, आदि नियमित करना चाहिए।
गर्म प्राकृतिक उपचार जैसे भाप स्नान, सोना बाथ, मालिश, गर्म सिंकाई, इत्यादि भी अब 9 दिसंबर के बाद शुरू किए जा सकते हैं।

ध्यान रहे,
पीठ की अधिक गर्म सिंकाई वात बढ़ाती है। जिससे डीजनरेशन की गति भी बढ़ती है। अतः अति आवश्यक होने पर ही सिंकाई करें। अधिक गर्म पानी सिर पर न डालें।
ठंड से बचने हेतु जितना आवश्यक हो उतना ही गर्म पानी स्नान के लिए उपयोग करें। धूप की सिंकाई पीठ पर और आग की सिंकाई सामने से की जाती है।

डॉ. पूर्णिमा दाते
(आयुर्वेद एवं रसाहार विशेषज्ञ)

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