वर्धा : हिंदी के प्रचार-प्रसार में गैर-हिंदी भाषियों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। किसी भी देश का संविधान या कानून किसी भाषा को वास्तविक अर्थों में राष्ट्रभाषा नहीं बना सकता।यह दायित्व उस देश के समाज का होता है।यह विचार पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के स्थापना दिवस पर आयोजित पत्रकारिता द्विशताब्दी समारोह के उद्घाटन अवसर पर व्यक्त किए।कार्यक्रम का आयोजन माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान द्वारा किया गया.
समारोह में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के प्रधानमंत्री डॉ. हेमचंद्र वैद्य, लोकमत समाचार के संपादक वरिष्ठ संपादक विकास मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार संजय तिवारी, प्रो. कृपाशंकर चौबे, एमजीआईएमएस के डॉ. ओमप्रकाश गुप्ता, महेश अग्रवाल तथा विजय व्यास सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित थे.

मुख्य वक्ता विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि किसी भी भाषा के प्रति द्वेष या दुराग्रह नहीं होना चाहिए, किंतु किसी विदेशी भाषा का अनावश्यक वर्चस्व भी उचित नहीं है।उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में अंग्रेज़ी के प्रति बढ़ते आकर्षण के कारण भारतीय भाषाओं की उपेक्षा हो रही है।यदि समाज में विज्ञान और ज्ञान का व्यापक प्रसार करना है, तो यह कार्य केवल बड़े शहरों या पांच सितारा होटलों में बैठकर इसकी चर्चा तक सीमित रहना उचित नहीं है।इसके लिए प्रत्येक राज्य में जाकर वहां की लोकभाषाओं में संवाद स्थापित करना आवश्यक है।हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की चाहत रखने वालों को पहले मराठी, तेलगु, कन्नड़ जैसी प्रादेशिक भाषाओं को सीखना चाहिए।उन्होंने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति से आग्रह किया कि आगामी गांधी जयंती के अवसर पर समिति परिसर में भारतीय भाषाओं का राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया जाए, जिससे विभिन्न भाषाओं के बीच संवाद, समन्वय और परस्पर सम्मान की भावना को बढ़ावा मिल सके।
कार्यक्रम के दौरान पूर्वोत्तर भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए उल्लेखनीय कार्य करने वाले श्यामबाबू शर्मा का सम्मान किया गया।साथ ही कृष्णकुमार द्विवेदी एवं बालकृष्ण महाजन द्वारा लिखित पुस्तकों का अतिथियों के करकमलों से विमोचन भी किया गया।कार्यक्रम की प्रस्तावना में समिति के प्रधानमंत्री डा. हेमचंद्र वैद्य ने समिति के कार्यों और विकास का लेखाजोखा प्रस्तुत किया.


सुन्दर सार्थक उद्बोधन , गैर हिन्दी भाषियों द्वारा हिंदी को विशेष स्थान दिया जा रहा है। यह सुखद है 🙏