सप्रे संग्रहालय में ‘शंभुदयाल गुरु इतिहासप्रभाग’ का लोकार्पण

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कर्मवीर सम्मान’ से विभूषित हुईं पाँच विभूतियां

ज्ञानतीर्थ सप्रे संग्रहालय की ज्ञान संपदा में एक नया आयाम तब जुड़ा जब सुप्रसिद्ध इतिहासविद् और मप्र राज्य गजेटियर एवं अभिलेखागार के पूर्व संचालक शंभुदयाल गुरु का बेशकीमती खजाना संग्रहालय की धरोहर में शामिल हुआ। स्व. गुरु की यह विशाल सामग्री उनके परिजनों ने संग्रहालय को सौंपी है। यह विरासत यहां का हिस्सा बनने के बाद संग्रहालय में ‘शंभुदयाल गुरु इतिहास प्रभाग’ की स्थापना की गई है।

इस नवीन प्रभाग का लोकार्पण संग्रहालय के 43 वें स्थापना दिवस 19 जून को हुआ। इस अवसर पर प्रदेश की पांच विभूतियों को ‘कर्मवीर सम्मान’ से सम्मानित भी किया गया। इनमें अध्येता एवं विशिष्ट संग्रहकर्ता डा. सुभाष अत्रे, विश्वरंग के प्रणेता संतोष चौबे, संस्कृति सेवी श्रीराम तिवारी, वरिष्ठ पत्रकार नूरुल हसन नूर और हिन्दी सेवी डा. जवाहर कर्नावट शामिल हैं।

मुख्य अतिथि पूर्व राज्यसभा सांसद एवं मानस भवन के अध्यक्ष सांसद श्री रघुनंदन शर्मा ने कहा कि हमेें अपने जीवन में एक न एक ऐसा कार्य अवश्य करके जाना चाहिए जो भावी पीढ़ी के काम आये। पुरखों की विरासत ही आने वाली पीढ़ी का मार्ग प्रशस्त करती है जो अंततोगत्वा समाज के ही काम आती है। इसका प्रमाण शंभुदयाल गुरु हैं। स्व. गुरु ने इतिहास के क्षेत्र में जो किया वह अपने आप में अनूठा है। उनके इस कार्य का लाभ नई पीढ़ी को कितना मिलेगा इसका अंदाज वे स्वयं अपने जीवनकाल में नहीं लगा पाये होंगे, लेकिन पीढिय़ां इसका उपयोग कर अपना भविष्य संवारेंगी। श्री शर्मा ने गुरु जी की ज्ञान संपदा सप्रे संग्रहालय को सौंपने के लिए गुरु परिवार के प्रति आभार भी प्रकट किया। उन्होंने धरोहरों को सहेजने के प्रयासों के लिए सप्रे संग्रहालय की सराहना भी की।

आरंभ में स्वागत वक्तव्य देते हुए संग्रहालय के संस्थापक निदेशक विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि सप्रे संग्रहालय में अब तक अनेकों विभूतियों के परिजनों ने सामग्री सौंपी है। यह संग्रहालय की विश्वसनीयता का ही प्रमाण है। इसी कड़ी में गुरु जी की पत्नी श्रीमती कमलेश गुरु ने जो यह खजाना सौंपा है इससे संग्रहालय की संपदा में और इजाफा हुआ। इसके लिए उन्होंने गुरु जी की चारों बेटियों के प्रति भी आभार माना। उन्होंने बताया कि समाज से मिले इस भरोसे का ही परिणाम है कि आज यहां पांच करोड़ पन्ने,पौने दो लाख किताबें, दस हजार पत्र, पच्चीस-तीस हजार पत्रिकायें यहां उपलब्ध हैं, इनकी संख्या में आगे वृद्धि होनी ही है।
इस अवसर पर अशोक मनवानी कृत मोनोग्राफ‘बेजोड़ कलमकार राजकुमार’ तथा ‘दूर और नजदीक से सरोज गुप्ता’ का विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम में सप्रे संग्रहालय के परिकल्पनाकार विजयदत्त श्रीधर को डीलिट की मानद उपाधि मिलने पर संग्रहालय के अध्यक्ष डॉ. शिवकुमार अवस्थी और मार्गदर्शक प्रो. रत्नेश ने उनका अभिनंदन किया। कार्यक्रम में गुरु जी की बेटियां रचना शुकुल, डॉ. प्रेरणा उपाध्याय, डॉ. मनीषा मिश्रा और स्वप्रा गुरु सहित अन्य परिजन एवं शहर के प्रबुद्धजन उपस्थित रहे। संचालन निदेशक अरविंद श्रीधर ने किया तथा आभार प्रदर्शन शोध विशेषज्ञ डा. अल्पना गिरी ने किया।

कर्मवीर सम्मान से सम्मानित विशिष्ट जनों ने भी अपने विचार व्यक्त किए….

सम्मानित विभूतियों द्वारा सम्मान के प्रति उत्तर के क्रम में सुभाष अत्रे ने कहा कि किसी भी वस्तु का संग्रह बहुत ही धैर्य और लगन से होता है,लेकिन एक बार जो संकलन आपने कर लिया वह वर्षों तक समाज के काम आता है। उन्होंने दादा माखनलाल चतुर्वेदी के पत्र कर्मवीर और दादा से अपने जुड़ाव का स्मरण भी किया। कवि-कथाकार संतोष चौबे ने कहा कि मूलत: मैं, विज्ञान से जुड़ा रहा लेकिन जब यह देखा कि विज्ञान की अपेक्षा साहित्य समाज को जोडऩे और सरस बनाने में कारगर है तो इस तरफ उन्मुख हुआ और कविता,कहानी और उपन्यास लगभग हर विधा में लेखन किया। संस्कृतिसेवी श्रीराम तिवारी ने कहा कि मैं हमेशा से ही संस्कृति के क्षेत्र में कार्य करता रहा हूं औैर आगे भी करता रहूंगा। उन्होंने बताया कि वीर भारत न्यास के माध्यम से वर्तमान में भारतीय ज्ञान परंपरा के क्षेत्र में कार्य कर रहा हूं। आंचलिक पत्रकार नूरूल हसन नूर ने कहा कि आजादी के बाद जब देश के दो टुकड़े हुए तब पाकिस्तान ने अपनी भाषा ऊर्दू घोषित कर उसे अनिवार्य कर दिया था नतीजतन पाक के टुकड़े होते रहे, लेकिन भारत ने हिंदी को अपनाया जरूर पर उसे अनिवार्य नहीं किया इसीका परिणाम है कि भारत आज भी अखंड है और रहेगा। यह हिंदी की सामर्थ्य का प्रमाण है। हिन्दी सेवी डॉ. जवाहर कर्नावट ने कहा कि मुझे देश ही नहीं विदेशों में भी सम्मान मिलते रहे हैं, लेकिन आज मिला यह सम्मान घरमें मिला सम्मान है। इसलिए यह मेरे लिए गौरव की बात है।

दीपक पगारे

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