खेजड़ी : थार का कल्पवृक्ष

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पीपल पर्यावरण और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, इसमें कोई संदेह नहीं। पर थार में ‘कल्पवृक्ष’ का दर्जा केवल खेजड़ी को ही प्राप्त है। विडंबना यह है कि इस जीवनदायिनी के संरक्षण और फैलाव के लिए आज तक जमीनी स्तर पर कोई विधिवत सरकारी योजना नहीं बनी, जबकि रेगिस्तान की सांसें और जनश्रद्धा इसी पेड़ से जुड़ी हैं।
भारतीय शुष्क क्षेत्र का क्षेत्रफल 3,20,000 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें करीब 70 हजार वर्ग किलोमीटर शीत मरुस्थल (कोल्ड डेजर्ट) है। यह क्षेत्र भारत के भौगोलिक क्षेत्र का 12 प्रतिशत है। इसका 62 प्रतिशत हिस्सा राजस्थान में है, जिसका अनुमानित क्षेत्रफल 1,96,000 वर्ग किलोमीटर है। नए प्रशासनिक पुनर्गठन के बाद प्रदेश के 19 जिले मरुस्थलीय श्रेणी में आते हैं। इसके अलावा 19 प्रतिशत गुजरात और 9 प्रतिशत पंजाब-हरियाणा में यह फैला है। ये चारों राज्य मिलकर 2,47,000 वर्ग किलोमीटर का शुष्क क्षेत्र घेरते हैं, जबकि 10 प्रतिशत शुष्क क्षेत्र आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में है।
इस शुष्क क्षेत्र थार को खेजड़ी ने ही जीवन दिया है। अत्यधिक सूखे और भीषण तापमान में भी सदाबहार रहने वाली खेजड़ी को राजस्थान में जांट या खेजड़ी, गुजरात में सुमरी, धार्मिक ग्रंथों में शमी, सिंध में कांडी, संयुक्त अरब अमीरात में गाफ और फारसी में जंद कहा जाता है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के 20 देशों में खेजड़ी जैसी प्रजातियां वहां के लोगों के लिए जीवन का आधार हैं। इजरायल और सऊदी अरब ने तो इसे बचाने और बढ़ाने के लिए अपने देशों में बाकायदा विशेष राष्ट्रीय योजनाएं चला रखी हैं।

खेजड़ी को बचाने के लिए किए गए त्याग और बलिदान की ऐतिहासिक गाथा पूरी दुनिया में बेमिसाल है। 12 सितंबर 1730 को जोधपुर के खेजड़ली गांव में अमृता देवी बिश्नोई ने खेजड़ी बचाने के लिए ऐतिहासिक हुंकार भरी थी- “सिर साटे रूंख रहे तो भी सस्तो जाण”। इसके बाद अमृता देवी विश्नोई, उनके परिवार 363 नर-नारियों सहित पेड़ों से चिपककर अपने प्राणों की आहुति दे दी। यह दुनिया का पहला ‘चिपको आंदोलन’ था। महल के निर्माण के लिए जोधपुर दरबार के कारिंदे चूना पकाने के लिए इस पेड़ को काटना चाहते थे, लेकिन लोगों ने खेजड़ी के प्रति अगाध श्रद्धा के कारण शहादत दे दी। इस महाबलिदान के बाद महाराजा ने खेजड़ी की कटाई पर पूर्ण रोक का आदेश जारी किया था।
परंतु आज का परिदृश्य चिंताजनक है। जिस खेजड़ी को बचाने के लिए हमारे पूर्वजों ने रक्त बहाया, आज उसी को हम आधुनिक विकास की होड़ में योजनाबद्ध तरीके से नष्ट कर रहे हैं। समाज ने इसे बचाने की संवेदनाएं खो दी हैं। हमारे पास खेजड़ी के जीवन को बचाने और बढ़ाने की कोई दीर्घकालिक नीति नहीं है, जबकि यह पेड़ थार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी (इकोलॉजी) का मुख्य आधार स्तंभ है।

रेगिस्तान के भयानक सूखे और अकाल में खेजड़ी ही मनुष्य और पशुधन का एकमात्र सहारा बनती है। इसका प्रत्येक भाग थार के जनजीवन को गति देता है। गर्मियों में इसका कच्चा फल ‘सांगरी’ सब्जी का मुख्य स्रोत है, जो पौष्टिक और स्वादिष्ट होती है। इसे सुखाकर पूरे वर्ष उपयोग में लिया जाता है। सांगरी जब पककर सूख जाती है, तो इसे ‘खोखे’ कहा जाता है, जिसे इंसान और मवेशी चाव से खाते हैं। इसके पत्ते ‘लूंक’ कहलाते हैं, जो ऊंट, गाय, भेड़ और बकरी का पसंदीदा चारा हैं। बाड़मेर के अरणियाली गांव के किसान मालाराम गोदारा के अनुसार खेजड़ी का एक पेड़ करीब तीन क्विंटल लूंक और 80-100 किलो ग्राम सांगरी देता है। एक बकरी को प्रतिदिन पांच किलोग्राम आहार चाहिए और एक गाय को प्रतिदिन बीस किलोग्राम आहार की जरूरत रहती है। एक गाय और एक बकरी पालने के लिए अनुमानित 30 खेजड़ी चाहिए। एक खेजड़ी से 10 हज़ार रुपये की आय सांगरी को सुखा कर बेचने से हो सकती है। वैसे बोरडी का पेड़ भी चारा देता है, जिसके पतों को पाला कहते है।

थार के पारंपरिक जनजीवन में खेजड़ी की लकड़ी का उपयोग कुओं से पानी सींचने के लिए भाण, ऊंट-गधे का जांतरा, बैलों का जुआ, हल की हाल, झोपड़ी के थम (स्तंभ) और खूंटियां बनाने में होता है। कृषि वैज्ञानिक डॉ प्रदीप पगारिया के अनुसार, एक स्वस्थ खेजड़ी प्रतिदिन 250 से 500 लीटर तक शुद्ध ऑक्सीजन देती है। इसकी जड़ें 70-80 फीट गहरी जाकर नमी सोखती हैं और नाइट्रोजन स्थिरीकरण के जरिए खेत की मिट्टी को उपजाऊ बनाकर ‘सोना’ कर देती हैं।
यह एक सदाबहार पेड़ है, जो मरुस्थलीय जैव विविधता को आश्रय देता है। यह बाज, होली, गोलाईयो, पीवा, पीअल, तिलोर, तीतर और कौओं का मुख्य बसेरा है। पेड़ के नीचे बेकर, झेरणिया, सटाडो और कुरी जैसी घासें उगती हैं, जो कम बारिश में भी पनप कर रेगिस्तान के फैलाव को रोकती हैं। खेतों में जहां खेजड़ी होती है, वहां फसल उत्पादन बेहतर रहता है। बाड़मेर के राणी गांव के पास ‘पाटिया’ की जमीन इसका अद्भुत उदाहरण है, जो खेजड़ी का सघन प्राकृतिक घर है। गांव में पर्यावरण कार्यकर्ता मूलसिंह, मांगीलाल इसे बचाने में लगे हैं। भयंकर सूखे और गर्मी में भी हरा-भरा रहने के कारण ही इसे लोकसंस्कृति में कल्पवृक्ष कहा गया है।

आज खेजड़ी का अस्तित्व घोर संकट में है, जिससे थार का पूरा जीवन खतरे में पड़ गया है। बाड़मेर, जैसलमेर, फलोदी और बीकानेर में स्थापित हो रहे सोलर पार्क, विंड मिल (पवन चक्की) और हाई-टेंशन बिजली लाइनों के लिए ओरण, गोचर और खेतों की हजारों बीघा सामूहिक जमीन साफ कर दी गई है। एक अनुमान के अनुसार, केवल जैसलमेर में 70-80 हजार बीघा और बाड़मेर के शिव क्षेत्र में 8-10 हजार बीघा भूमि से खेजड़ी को खत्म कर दिया गया।

जलवायु परिवर्तन के कारण थार में अचानक बढ़ी बेमौसम बारिश और नमी से पेड़ों में फंगल संक्रमण (कवक रोग) और कीटों का प्रकोप बढ़ा है। इससे खेजड़ी के तने व जड़ें संक्रमित हो रही हैं और सांगरी का उत्पादन घट रहा है। चिंताजनक बात यह है कि इस बीमारी की रोकथाम के लिए स्थानीय स्तर पर कोई वैज्ञानिक योजना काम नहीं कर रही है।

यदि आर्थिक दृष्टि से देखें, तो मरुस्थलीय क्षेत्र ने सरकार के खजाने को भरपूर राजस्व दिया है। उदाहरण के लिए, केयर्न जैसी कंपनी ने वर्ष 2009 से 2024 तक सरकार को राजस्व के रूप में 50 हजार करोड़ रुपये दिए हैं। पचपदरा रिफाइनरी से भी प्रतिवर्ष 6 हजार करोड़ रुपये मात्र जीएसटी आय की संभावना है। इस विशाल राजस्व का एक हिस्सा खेजड़ी, रोहिड़ा, कुमट, बोरडी, जाल जैसी थार की विशिष्ट वनस्पतियों और सेवण-धामण जैसी घासों के संरक्षण के लिए क्यों नहीं रखा जाता? सरकार को डेजर्ट इकोलॉजी और रूरल इकोनॉमी के लिहाज से तुरंत कड़े नीतिगत निर्णय लेने चाहिए।
केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) ने अनुसंधान से ‘थार शोभा’ जैसी खेजड़ी की उन्नत और जल्दी फल देने वाली किस्म विकसित की है, जिसे आम खेतों तक युद्धस्तर पर पहुंचाने की जरूरत है। यह किस्म रोपण के तीन साल में ही सांगरी का उत्पादन देने लगती है.खेजड़ी का जीवनकाल सामान्यतया 150 से 400 साल तक होता है।
खेजड़ी रेगिस्तान के फैलाव को रोकती है। अब जरूरत इस विचार को धरातल पर सरकारी नीति में उतारने की है। सरकार को खेजड़ी की अवैध कटाई को पूरी तरह प्रतिबंधित करते हुए व्यापक स्तर पर ‘खेजड़ी बचाओ, लगाओ, पनपाओ अभियान’ शुरू करना चाहिए। एक विधिवत ‘खेजड़ी संरक्षण नीति’ तय कर प्रत्येक किसान के खेत, मेड़ों, ओरण-गोचर और सार्वजनिक जमीनों पर खेजड़ी के साथ स्थानीय प्रजातियों (रोहिड़ा, कुमट, बोरडी, जाल) के पौधे लगाना अनिवार्य किया जाए। इसके लिए विशेष बजटीय प्रावधान हो, ब्लॉक स्तर पर नर्सरी बने और फंगल संक्रमण की रोकथाम के लिए कृषि वैज्ञानिकों की देखरेख में एक व्यापक कार्ययोजना तैयार की जाए।
वर्ष 1983 में राजस्थान के गौरवशाली वृक्ष खेजड़ी को ‘राज्य वृक्ष’ घोषित किया गया। इसे बचाए बिना थार के जनजीवन और लोकसंस्कृति की कल्पना अधूरी है। यदि विकास के नाम पर हमने इस कल्पवृक्ष को खो दिया, तो रेगिस्तान केवल सीमाओं में ही नहीं फैलेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इस मरुधरा पर सांसें लेना भी मुश्किल हो जाएगा।

डॉ. भुवनेश जैन
(लेखक मरुस्थलीय जनजीवन, लोककलाएं और पर्यावरण पर निरंतर लिखते रहते हैं।)
संपर्क: 250/95, प्रताप एन्क्लेव, हल्दीघाटी मार्ग, प्रताप नगर, सेक्टर 25, जयपुर – 302017
ई-मेल: Bhuwanesh.india@gmail.com

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