पितृतारण तीर्थ अवन्तिका

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वैदिक एवं पौराणिक आख्यानों में पितृलोक का उल्लेख मिलता है। पितृलोक के अधिपति मृत्यु के देवता यम हैं,जो कर्म के अनुसार पुनर्जन्म अथवा मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं। यह भी मान्यता है कि कर्मफल अनुसार पुनर्जन्म अथवा मोक्ष होने तक आत्मा पितृलोक में ही निवास करती है।

पुनर्जन्म अथवा मोक्ष के लिए प्रतीक्षारत सूक्ष्मशरीरी पूर्वजों की शांति के लिए ही सनातन धर्म में तर्पण एवं श्राद्ध जैसे अनुष्ठानों की व्यवस्था की गई है। इन अनुष्ठानों को पितृकार्य भी कहा जाता है। सनातन परंपरा में श्राद्ध आदि पितृकर्म को अपरिहार्य कर्त्तव्य माना गया है। यहाॅं तक कि स्कन्दपुराण में पितृकार्य को देवकार्य से भी विशिष्ट कहा गया है-
“देवकार्यात्परं कार्यं पितृकार्यं विशिष्यते।”

धर्मशास्त्रों के अनुसार मनुष्य पर तीन ऋण कहे गए हैं- देवऋण,ऋषिऋण और पितृऋण। यज्ञ- हवन, पूजा-पाठ आदि सत्कर्म देवऋण से मुक्ति दिलाते हैं। स्वाध्याय और ज्ञानदान ऋषिऋण से मुक्ति का उपाय है। श्राद्धकर्म के द्वारा मनुष्य पितृऋण से उऋण होता है।

शास्त्रों में गयाजी, प्रयागराज, काशी ब्रह्मकपाल
(बद्रीनाथ धाम), पुष्कर, कुरुक्षेत्र तथा उज्जयिनी आदि तीर्थस्थानों का उल्लेख मिलता है, जहाॅं पितृकर्म संपादित करना विशिष्ट फलदायी माना गया है। पौराणिक एवं लोकमान्यता के अनुसार गयाजी में किया गया श्राद्ध अक्षय फलदायक माना जाता है। स्कन्दपुराण का कथन है कि अवन्तिका महाकालवन में स्थित गयाकोटा तीर्थ में किया गया श्राद्ध-तर्पण इससे भी अधिक फलदायी है।

महालया के दिन वृद्धिश्राद्ध से पितरों को सौगुना तृप्ति का लाभ होता है। इससे भी दसगुना तृप्ति प्रयाग में श्राद्ध से होती है। कुरुक्षेत्र में श्राद्ध द्वारा इससे भी दसगुनी तृप्ति होती है। गया में श्राद्ध द्वारा इससे भी दसगुनी तृप्ति प्राप्त होती है। महाकालवन में श्राद्ध करने से इससे भी दसगुनी तृप्ति पितरों को प्राप्त होती है। अवन्ती में स्थित गयातीर्थ पर श्राद्ध करने से सभी तीर्थों में किए गए श्राद्ध से भी अधिक तृप्ति पितृगण प्राप्त करते हैं। जिनके पितृगण जन्म-जन्मान्तर से अधोलोक में पड़े हैं,उन पितरों के उद्धार के लिए यह अवन्ती स्थित गयातीर्थ सुदुर्लभ है।

स्कन्दपुराण में अवन्तिका के ऐसे अनेक तीर्थों का वृतान्त मिलता है जहाॅं पितृकर्म श्राद्ध-तर्पण करना विशेष फलदायी बताया गया है। स्वयं भगवान श्रीराम द्वारा शिप्रा स्नान करने, अपने पिता महाराज दशरथ का तर्पण करने, महाकाल के दर्शन करने एवं शिप्रा तट पर “रामेश्वर’ संज्ञक लिङ्ग स्थापित करने का उल्लेख स्कन्दपुराण में मिलता है। जिस तीर्थ में साक्षात परमेश्वर स्वरूप भगवान श्रीराम ने अपने पूर्वजों का तर्पण किया हो, उस तीर्थ के मोक्षप्रद होने में भला क्या संदेह हो सकता है!

*अरविन्द श्रीधर

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