‘अस्सी के राय साहब’ पुस्तक का लोकार्पण शुक्रवार को दिल्ली के अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में संपन्न हुआ. अग्रजश्रेष्ठ और वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय के व्यक्तित्व और कृतित्व के जरिए पत्रकारिता और राजनीति का इतिहास बताती इस किताब का विमोचन रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने किया।
यह किताब राय साहब के जीवन के आठ दशकों की कहानी है। लगभग सवा सौ लेख इस पुस्तक का हिस्सा हैं। और ये लेख राय साहब के साथ समाज के अलग-अलग हिस्सों का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्तियों का अनुभव बयान करते हैं। किताब प्रभात प्रकाशन से छपी है। पत्रकारिता, राजनीति और समाज के ६५ वर्षों का इतिहास बयान करती यह पुस्तक संग्रहणीय और पढ़ने योग्य है।
यह किताब क्यों? कई मित्रों का सवाल है। राम बहादुर राय में ऐसा क्या है कि उनके योगदान पर सौ विद्वान अपनी राय रखें। संपादक और पत्रकार तो बहुतेरे हुए. फिर उन पर क्यों नहीं? अस्सी बरस के तो कई और संपादक हैं। फिर राय साहब में ऐसा क्या है? कौन-सा सुर्खाब का पर है? ख़ुद राय साहब का सवाल भी यही है।
राय साहब पर लिखना इसलिए जरूरी है कि उनका कोई निजी जीवन नहीं है। जो कुछ है वह सार्वजनिक है। उनका जीवन 70 के बाद की राजनीति का इतिहास है। जन आंदोलनों का दस्तावेज है। यह राष्ट्रवादी राजनीति के गर्भ से निकले एक ऐसे नेता/पत्रकार के व्यक्तित्व और कृतित्व का परिचय है, जिसके विचारों में ‘गांधी’ का ‘हिंद स्वराज’, ‘लोहिया’ की ‘सप्त क्रांति, ‘जेपी’ की ‘संपूर्ण क्रांति, ‘अम्बेडकर’ का ‘जातिमुक्त भारत, ‘दीनदयाल उपाध्याय’ का ‘अंतिम आदमी’ और ‘आचार्य कृपलानी’ के ‘गांधीवादी समाजवाद’ के सूत्रों की विरासत है। जिसके व्यक्तित्व में तमाम विरुद्धों का सामंजस्य है। वे जिस विचार के विरोधी हैं उसे भी बहस में लाने की कोशिश करते हैं। उनके लेखन में सावरकर के ‘राष्ट्रवाद’ पर गांधी का ‘हिंद स्वराज’ भारी पड़ता है। इन सभी विचारधाराओं से जो थोड़ा-थोड़ा नवनीत निकलता है, उससे एक ‘राम बहादुर राय’ बनते हैं। उनका प्रेरक और प्रोत्साहक व्यक्तित्व समकालीन हिन्दी पत्रकारिता का ‘लाइट हाउस’ है।
राय साहब पर किताब इसलिए ज़रूरी है क्योंकि राय साहब आज की पत्रकारिता और तमाम पत्रकारों को शर्मिंदा करते हैं। वे सत्ता में रहते हुए भी सत्ता की मैगिनेटिक फील्ड से बाहर हैं। वे तमाम प्रभावशाली लोगों, अवसरों और आमंत्रणों के बावजूद एक सुचिता, दूरी और निश्चेष्टता बनाए रखने का व्रत-सामर्थ्य रखते हैं। एक शिवलिंग की तरह वो अपने ऊपर कोई भी रंग राग चढ़ने नहीं देते। उनको बहुत अच्छे से पता हैं अपनी सीमाएं, इच्छाएं और इनके अतिक्रमण को रोकने का तरीका भी। सादगी, शराफ़त और संघर्ष के बारे में बड़े से बड़े लोगों के विचार और व्यवहार में फर्क मिल जाता है, राय साहब के पास ये दोनों एक ही हैं। किसी भी पत्रकार या राजनीतिक व्यक्ति के जो स्वाभाविक मोह हैं, राय साहब उस मायामंडल से मुक्त हैं। ये व्यक्तित्व राय साहब को हमारे समय की धरोहर बनाता है।
जब राजनीति और पत्रकारिता व्यक्ति केंद्रित और एकतरफा हैं, ऐसे दौर में राय साहब संवादी पत्रकार हैं। आज संवाद पर सबसे बड़ा संकट है। संवाद की इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने तीन किताबें, “रहबरी के सवाल”, “मंजिल से ज्यादा सफर” और “भारतीय संविधान: अनकही कहानी” लिख दी। जो भारत के समाज, इतिहास और राजनीति का प्रामाणिक इतिहास हैं। संवाद की परम्परा ही हमारी सनातन परम्परा है। इसलिए राय साहब संघर्ष में भी प्रतिपक्षी से संवाद जारी रखते हैं.
राम बहादुर राय पर किताब इसलिए भी जरूरी है कि वह पत्रकारिता के ‘प्रभाष परम्परा’ के वारिस है। वे राजनीति की किसी एक धारा से बंधे नहीं है।
उनकी स्वीकार्यता परस्पर विरोधी खेमों में भी गजब की है। अपनी प्रतिबद्धताओं के प्रति सचेत रहते हुए विभिन्न राजनीतिक दलों और संगठनों के साथ बेहतर रिश्ता बनाए रखना उनका हुनर है। ईर्ष्या से उनका वही संबंध है जो मलेरिया से ‘कुनैन’ का। चंद्रशेखर, वीपी सिंह, चितरंजन सिंह और संघ राजनीति के चार छोर हैं। राय साहब सबके प्रिय रहे.
राम बहादुर राय पर यह किताब इसलिए भी जरूरी है कि उनके बारे में कम कहा और लिखा गया है। वह खुद कुछ बताते नहीं। अपने होने को जताते नहीं। जीवन में खुद कुछ पाने का कभी प्रयास नहीं किया। राजनीति में जगह बनाई लेकिन पत्रकारिता में मन रमा लिया। उनकी पेशेवर पत्रकारिता हम सबके लिए मिसाल ही नहीं ‘मशाल’ भी है। पद्म सम्मान के प्रति उनकी निस्पृहता इसका उदाहरण है। राय साहब सम्मानित होने के लिए राष्ट्रपति भवन नहीं गए। हर बार सम्मान चलकर उनके पास आया। राय साहब फोटोग्राफिक समृति के वाहक, अनंत जिज्ञासु, निरभिमानी, सर्वसमावेशी, जन आंदोलनों के पोषक और सच के साथी हैं। राजनीति, समाजशास्त्र, संविधान, संचार, पत्रकारिता और भारतबोध पर उनका अध्ययन बेमिसाल है।
मनुष्य को समझने के दो तरीके होते हैं। पहला- उसकी उपलब्धियों की सूची बनाकर। दूसरा- उसके प्रभाव को समझकर। पहला काम इतिहास करता है और दूसरा स्मृति। इतिहास आपको बता देगा कि किसी व्यक्ति ने क्या किया? कहाँ रहा? किन पदों पर रहा? कौन-सी पुस्तकें लिखीं? लेकिन स्मृति यह बताती है कि उस व्यक्ति की उपस्थिति ने दूसरों के जीवन में क्या बदला। रामबहादुर राय के बारे में लिखते हुए मुझे हमेशा लगता है कि उन्हें उपलब्धियों की सूची में समेटना उनके साथ अन्याय होगा। क्योंकि कुछ लोग अपने काम से बड़े होते हैं, कुछ अपने विचारों से, और कुछ अपने व्यक्तित्व से। वे धीरे-धीरे एक मूल्य में बदल जाते हैं, एक परम्परा में बदल जाते हैं। एक नैतिक संदर्भ में बदल जाते हैं। मैं राय साहब को इसी श्रेणी में रखता हूँ.
भारतीय परंपरा में एक शब्द है- ‘ऋषि’. ऋषि सिर्फ धार्मिक परिधि से बंधा शब्द नहीं है। कबीर संत हैं, क्योंकि उन्होंने सत्य को किसी संस्था का बंधक नहीं बनने दिया। नानक संत हैं, क्योंकि उन्होंने मनुष्य को उसके मूल रूप में देखने का साहस किया। महात्मा गांधी को भी इसी अर्थ में संत कहा जा सकता है, क्योंकि उन्होंने राजनीति को नैतिकता से जोड़ने का प्रयास किया। ऋषि वह है जो अपने समय को देख सके, लेकिन उसकी धूल से अपनी दृष्टि को धुँधला न होने दे। जो समाज के बीच रहे, लेकिन समाज की क्षणिक उत्तेजनाओं से संचालित न हो। जो सत्ता को समझे, लेकिन उससे मोहित न हो। पत्रकारिता की भी अपनी एक ऋषि-परम्परा पं. बाबूराव विष्णु पराड़कर से शुरू होती है। ऐसे पत्रकार, जो समाचारों के व्यापारी नहीं थे; जो घटनाओं के पीछे छिपे हुए नैतिक प्रश्नों को पहचानते थे। जिनके लिए पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, लोकधर्म थी। राम बहादुर राय उसी ऋषि-परम्परा के प्रतिनिधि हैं। राय साहब इसी संत परम्परा के साधक हैं। आप इस नैतिकता का पालन करने वाले भावी पत्रकारों को राय साहब की परम्परा का वाहक मान सकते हैं।
उनका जीवन हमें एक और बड़ी सीख देता है. सार्वजनिक जीवन में संबंध होना महत्वपूर्ण है, लेकिन संबंधों से स्वतंत्र रहना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। जयप्रकाश नारायण, चंद्रशेखर, विश्वनाथ प्रताप सिंह, गोविंदाचार्य- देश की राजनीति के अनेक बड़े नाम उनके जीवन में आए। वे उनके निकट भी रहे। लेकिन उनकी निकटता ने उनकी दृष्टि को कभी बंधक नहीं बनाया। पत्रकारिता की असली परीक्षा यही होती है। सत्ता से दूरी बनाकर निष्पक्ष होना अपेक्षाकृत आसान है। सत्ता के निकट रहकर स्वतंत्र बने रहना कठिन है। रामबहादुर राय ने यह कठिन काम किया। शायद इसलिए उनके जीवन को केवल पत्रकारिता की कसौटी पर नहीं परखा जाना चाहिए। उसे नैतिकता की कसौटी पर भी परखा जाना चाहिए। और वहाँ भी वह उतना ही उज्ज्वल दिखाई देता है.
आज जब सार्वजनिक जीवन में शोर बढ़ता जा रहा है, जब विचारों की जगह तेजाबी प्रतिक्रियाएँ लेती जा रही हैं, जब उछलती-कूदती पत्रकारिता कई बार अपने ही उद्देश्य को भूलती हुई दिखाई देती है, तब रामबहादुर राय जैसे लोग हमें याद दिलाते हैं कि पत्रकारिता का अंतिम उद्देश्य सत्ता तक पहुँचना नहीं, सत्य तक पहुँचना है।
(वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा की फेसबुक वाल से साभार)

