उच्च शिक्षण संस्थानों में हाल ही में लागू किए गए ‘समानता संवर्धन विनियम 2026’ को लेकर देशभर में मचे बवाल के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री का यह आश्वासन तो देश के समक्ष आ गया कि ‘कानून का दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा…किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा’; लेकिन सरकार देश के शैक्षणिक संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा की उपलब्धता सुनिश्चित करेगी,इस आश्वासन के फलीभूत होने की प्रतीक्षा देश वर्षों से कर रहा है।
समानता संवर्धन के लिए चिंतित सरकार इस बारे में क्यों नहीं सोचती कि तमाम दावों के बाद भी समानता आखिर सपना क्यों है? भारतीय नागरिकों को ‘समानता का अधिकार’,संविधान द्वारा मूल अधिकार के रूप में प्राप्त है,फिर भी समानता संवर्धन जैसे विनियमों की आवश्यकता क्यों है?
सरकार,साथ ही जातिगत अस्मिता के नाम पर उबल पड़ने वाले समूहों को कभी यह भी गंभीरता से सोचना चाहिए कि सिर्फ कानून बना देने से क्या समस्याओं का समाधान संभव है?
मंडल आयोग की सिफारसें लागू होने से क्या पिछड़े वर्ग में बेरोजगारी की समस्या हल हो गई?
आरक्षण का झुनझुना क्या संबंधित वर्ग के युवाओं की बेरोजगारी समाप्त कर सका?
यह समझना रॉकेट साइंस जैसा जटिल तो नहीं है कि अच्छी से अच्छी शिक्षा नीति भी तब तक श्रेष्ठ परिणाम नहीं दे सकती जब तक शैक्षणिक संस्थानों को सुविधा संपन्न नहीं बना दिया जाएगा। प्राथमिक शालाओं से लगाकर विश्वविद्यालयों तक में शिक्षकों के खाली पदों को भरा नहीं जाएगा। देश में उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ मेधा को शिक्षकीय पेशा अपनाने के लिए प्रेरित नहीं किया जाएगा।
लेकिन ऐसा कुछ होता हुआ फिलहाल तो नजर नहीं आता। दर्जनों उदाहरण मौजूद हैं,जब बड़े जोर-शोर के साथ खाली पदों को भरने और शैक्षणिक संस्थानों को सुविधा संपन्न बनाने की मुहिम प्रारंभ होती है,और थोड़े दिनों के बाद,लगभग बगैर किसी स्थाई नतीजे पर पहुंचे,शांत भी हो जाती है। कड़ी मेहनत के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने वाले युवाओं के हिस्से में आती है,नियुक्ति पत्र पाने की अंतहीन प्रतीक्षा,जो स्वाभाविक तौर पर उन्हें कुंठित करती है।
युवाओं का यह सोचना कतई असंगत नहीं लगता कि बारहों महीने,सातों दिन और चौबीसों घंटे सिर्फ वोट के बारे में सोचने वाले राजनीतिक दल, ना तो सामाजिक समरसता के प्रति गंभीर हैं और ना ही बेरोजगारी को लेकर।जाति,धर्म,भाषा आदि के नाम पर बंटा समाज उन्हें अपनी राजनीति के लिए ज्यादा मुफीद लगता है। इसीलिए कभी आरक्षण का शिगूफा छोड़ दिया जाता है और कभी समानता संवर्धन जैसे विनियम का। धर्म और जाति के नाम पर विभाजित समाज सड़कों पर उतर पड़ता है,और मूल समस्या कहीं पीछे छूट जाती है।
अब तक का अनुभव बताता है कि शैक्षणिक सुधारों के नाम पर समय-समय पर जो भी कदम उठाए गए हैं,वह परिणाममूलक कम,प्रचारमूलक अधिक साबित हुए हैं।
कदम-कदम पर विश्व गुरु होने का दंभ भरने वाले जिम्मेदारों को पता नहीं यह साधारण सी बात क्यों समझ में नहीं आती कि विश्व का सबसे बड़ा संविधान बना लेने अथवा नित नए अधिनियम बना देने भर से समस्याओं का समाधान नहीं होता। समाधान निर्भर करता है संविधान और विनियम लागू करने वालों की नियत पर।
डॉ अंबेडकर ने स्पष्टतः कहा था – ‘संविधान कितना भी अच्छा क्यों ना हो,यदि उसे लागू करने वाले लोग अच्छे नहीं हैं,तो वह अंततः बुरा ही साबित होगा।’
लॉर्ड मैकाले को कोसते हुए पीढ़ियां गुजर गईं,लेकिन अब तो लगता है कि देसी मैकाले भी नहीं चाहते कि युवाओं को गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा प्राप्त हो। आखिर उन्हें भी तो अपनी रैलियों के लिए भीड़ चाहिए। यदि गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा प्राप्त कर युवा उचित-अनुचित का विचार करने लगेंगे तो रेलियों में झंडे कौन उठाएगा? जाति,समाज और धर्म के नाम पर उन्माद पैदा कर अपने स्वार्थ की रोटियां सेंकने के लिए ईंधन कहां से मिलेगा?
और उस समाज के बारे में तो क्या ही कहा जाए जो किसी विनियम के लागू होने की संभावना मात्र से तो उद्वेलित हो उठता है,लेकिन उच्च शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बनाने की मांग को लेकर सरकार के समक्ष कभी खड़ा नहीं होता।
जातीय अस्मिता के नाम पर उबाल खाने वाला समाज शैक्षणिक संस्थानों में खाली पड़े पदों को भरने के लिए लामबंद होकर उठ खड़ा हुआ हो,पिछले 20-25 सालों में ऐसा कुछ देखने-सुनने में तो नहीं आया।
विडंबना यह भी है कि लाखों रुपए का कर्ज लेकर हम अपने बच्चो का दाखिला विदेशी शैक्षणिक संस्थानों में करवाने के लिए तो राजी हैं,लेकिन सरकार पर यह दबाव बनाने के लिए तैयार नहीं है कि देश में ही विश्व स्तरीय शैक्षणिक संस्थान खोले जाएं। प्राथमिक शालाओं से लगाकर महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों को सुविधा संपन्न बनाकर ऐसे माहौल का सृजन किया जाए,ताकि विद्यार्थी केवल सूचनाओं का नहीं,ज्ञान का भंडार बनकर संस्थानों से निकलें। उच्च शिक्षण संस्थानों में शोध कार्यों के लिए ऐसी सुविधाएं और माहौल सृजित किया जाए,ताकि भारतीय विश्वविद्यालयों के शोध प्रबंध विश्व स्तर पर मान्यता और प्रतिष्ठा प्राप्त करें।
दुनिया के विकसित देश जहां अपनी जीडीपी का 6 से 10% हिस्सा शिक्षा पर खर्च करते हैं,वहीं भारत महज 3 से 4% ही शिक्षा पर खर्च कर रहा है। इसे देखते हुए निकट भविष्य में शिक्षा के क्षेत्र में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन आएगा,ऐसी उम्मीद करना बेमानी होगा।
ऐसी स्थिति में हमारे पास दो ही विकल्प हैं। या तो हम संगठित आवाज बनकर सरकार को ऐसे कदम उठाने के लिए विवश कर दें,ताकि शिक्षा उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता में शुमार हो सके,या फिर आरक्षण और समानता विनियम जैसे झुनझुनों से खेलते रहें,जो सरकार ने मन बहलाव के लिए हमारे हाथों में थमा रखे हैं।
*अरविन्द श्रीधर

