बेतवा नदी मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की एक प्रमुख नदी है जो भोपाल से मात्र 20 किमी दूर झिरी गांव के वनक्षेत्र से शुरू होकर उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में यमुना में मिलने से पहले लगभग साढ़े पांच सौ किमी का लम्बा सफर तय करती है l मध्य भारत की गंगा और बुंदेलखंड की जीवन रेखा कहलाने वाली इस नदी पर भी देश की सैकड़ों नदियों की तरह संकट के गहरे बादल छाए हुए हैं l नदी में निरन्तर कम होते पानी और तेजी से बढ़ते प्रदूषण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए “बेतवा अध्ययन एवं जनजागरण समूह ” ने फ़रवरी मार्च 2023 में बेतवा नदी की अध्ययन एवं जनजागरण वात्रा आयोजित की थी l सात दिन की लगभग 200 किमी लम्बी यात्रा में बेतवा नदी के उद्गम स्थल झिरी ग्राम से कुरवई तक नदी के किनारे स्थित लगभग चार दर्जन गांवों और आधा दर्जन कस्बों एवं शहरों के स्कूल, कॉलेज के विद्यार्थियों, प्रबुद्ध जनों और ग्राम वासियों से बेतवा की दिन ब दिन बदतर होती स्थिति पर गंभीर चर्चा और जन-जागरण किया था l यात्रा के बाद मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव एवं मुख्यमंत्री से भी बेतवा नदी के संरक्षण की अपील की गई थी l

दुर्भाग्य से सरकारी संवेदनहीनता और नागरिकों की उदासीनता के चलते 2025 की गर्मियों में बेतवा नदी का उद्गम स्थल सूख गया l नदी के सूखे उद्गम स्थल को जन-सहभागिता से पुनर्जीवित करने के लिए पिछले साल “बेतवा अध्ययन एवं जनजागरण समूह” ने एक सप्ताह के श्रमदान से ५५ चैक डैम बनाकर उद्गम स्थल को आंशिक रूप से पुनर्जीवित किया था l
बेतवा नदी के सूखे उद्गम स्थल को पुनर्जीवित करने और नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए “बेतवा अध्ययन एवं जनजागरण समूह” द्वारा जन सहभागिता पर आधारित व्यापक अभियान पिछले तीन वर्षों से निरन्तर चलाया जा रहा है l
इस वर्ष भी 10 मईं 2026 से झिरी (जिला रायसेन-कोलार रोड) उद्गम स्थल पर, यह अभियान एक सप्ताह के श्रमदान शिविर के रूप में नए विश्वास, उमंग और अधिक संख्या में नदी-प्रेमियों के साथ पुन: आयोजित किया गया l इस अवसर पर समाज सेवियों , सेवानिवृत्त और सेवारत वरिष्ठ अधिकारियों , उच्च न्यायालय के वकील, वास्तुकार, पत्रकार और स्थानिय ग्रामीणों ने अपनी न सिर्फ उपस्थिति दर्ज कराई वरन् बेतवा (वेत्रवती) के उद्गम स्थल को प्राकृतिक रूप से पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया। इस वर्ष श्रमदान में 200 से अधिक बेतवा-प्रेमियों ने भाग लिया।
पिछले वर्ष बनाये 55 छोटे-छोटे स्टॉप डैम से उद्गम स्थल को आंशिक पुनर्जीवन मिला है, किंतु इसे सदानीरा बनाने के लिए अभी काफी काम करना बाकी है। मध्य प्रदेश शासन ने भी इस अभियान को गंभीरता से लिया है और नदी को प्रदुषण से बचाने का भरोसा दिया है। भोपाल, रायसेन, विदिशा, इदौंर, सिहोर , बैतूल और जौनपुर आदि जिलों से अनेक पर्यावरण कार्यकर्ता, नदी-प्रेमी व सामाजिक संस्थाएं इस पवित्र समागम में शामिल हुए l उन्होंने कई घंटे चिलचिलाती धूप में श्रमदान कर पुराने स्टाप डैम/ चैक डैम की मरम्मत की और 85 नए चैक डैम बनाये।

नदियां समाज की संपत्ति हैं और उन्हें बचाना भी समाज का दायित्व है l समाज की सहभागिता के बगैर नदियों का पुनरुद्धार नहीं हो सकता। सरकारों की अपनी प्राथमिकता और सीमाएं होती हैं,लेकिन यदि समाज खडा हो जाए तो वह नदियों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों को अपने दम पर भी बचा सकता है और सरकारों को भी उन्हें संरक्षित करने के लिए बाध्य कर सकता है l
हर छोटे बड़े काम को इवेंट बना देने के इस दौर में, सरकार से बहुत उम्मीद नहीं की जानी चाहिए।
बेतवा समूह द्वारा बेतवा के पुनर्जीवन के लिए किए जा रहे प्रयास भले ही छोटे कहे जाएं, लेकिन पिछले तीन साल में जिस तरह नदी के लिए आगे बढ़कर श्रमदान करने वाले प्रकृति प्रेमियों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ रही है उसे देखते हुए ऐसा लगता है कि ऐसे अभियान नदियों और जलस्रोतों के प्रति सामाजिक जागरूकता के लिए मील का पत्थर साबित हो सकते हैं।

आर.के. पालीवाल
(लेखक आयकर विभाग के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी हैं। गांधीवादी विचारधारा के अनुयायी हैं। विगत 4-5 वर्षों से बेतवा नदी पुनर्जीवन के लिए कार्य कर रहे हैं।)

