सांझ मौन ओढ़े खड़ी है, प्रभात की नव वेला भी उदासी में लिपटी है। अभी-अभी भारतीय लोक-चेतना का एक जाज्वल्यमान नक्षत्र टूट गया। एक स्वर, जो दशकों से हमारी चेतना के बीहड़ों में गूंज रहा था, वह अनंत के सन्नाटे में विलीन हो गया। मानों साक्षात पंडवानी ने अपनी आँखों में करुणा के अश्रु भरकर अपने गांडीव को विश्राम दे दिया।
लोक और शास्त्र जहाँ अपनी सीमाओं को विस्मृत कर एक आदिम आलिंगन में बंध जाते हैं, वहीं पंडवानी का प्राकट्य होता है, और जब पंडवानी अपनी संपूर्ण विराटता में साकार होती है, तो साक्षात तीजन बाई का बिम्ब सम्मुख कौंध जाता है। तीजन बाई वाचिक परंपरा की वह देदीप्यमान मशाल थीं, जिसने वेद-व्यास की संहिताओं को आदिवासियों की झोपड़ियों तक, और लोक की पगडंडियों को वैश्विक मंचों के वैभव तक पहुँचाया।
मेरे स्मृति के झरोखे में भोपाल के लोकरंग महोत्सव की वह धुंधली सी शाम आज भी दीपक की तरह जल रही है, जब उन्हें पहली बार सामने से देखने और सुनने का सुअवसर मिला था। उस दिन भोपाल की सर्द हवाएं तीजन बाई की तान से गर्माहट पा रही थीं। मंच पर उनका अवतरण किसी मानवीय उपस्थिति से इतर, लोक-देवताओं के आह्वान जैसा कौतुक उत्पन्न कर रहा था। हाथ में मोरपंखी तंबूरा लिये कई-कई बार उन्हें सामने से देखने का यह अनुभव लोक के उस अनथक प्रवाह को साक्षात जी लेने जैसा था, जहाँ इतिहास, पुराण और वर्तमान की दूरियां मिट जाती थीं।
तीजन बाई के कंठ में भारत की सदा सनातन, नित-नूतन सदानीरा लोक-संस्कृति का अमृतमयी लालित्य तो था ही, उसमें महाभारत के महापात्रों का हाहाकार और करुणा भी घुली हुई थी। उनका तंबूरा कभी अर्जुन का गांडीव बन जाता, कभी भीम की गदा, कभी दुशासन की छाती चीरती उंगली, तो कभी द्रौपदी के खुले केशों का करुण विलाप। अनुप्रास की छटा बिखेरती उनकी बोली में जब ‘मोर भइया हो’ की गूंज उठती थी, तो श्रोता उस कालखंड में यात्रा करने लगते थे जहाँ मर्यादा और प्रतिशोध का महायुद्ध लड़ा जा रहा था।
शब्दों की तीखी कसावट। वाक्यों का एक अनूठा, अनथक प्रवाह। नए-नए बिम्बों का संधान। जब वे कीचक वध का प्रसंग छेड़ती थीं, तो मुखमंडल पर क्रोध की झुर्रियां किसी प्राचीन शिलाचित्र की भाँति जीवंत हो उठती थीं। स्वर चरम पर गूँजता। और फिर, अचानक एक गहरा ठहराव; जो कोलाहल के बीच भी शून्य पैदा कर देता था, और फिर अचानक ही उस शून्यता को चीरता हुआ उनका प्रखर स्वर गूंज उठता था। वे जब गाती थीं, तो ऐसा लगता था मानो छत्तीसगढ़ की लाल माटी के कण-कण से कंकड़ पत्थर उठकर सुरों के पहरेदार बन गए हों। उनकी प्रस्तुति में जो लालित्य था, वह किसी राजदरबार की नजाकत का नहीं, बल्कि सावन की पहली फुहार में भीगती धरती का सौंदर्य था।
शास्त्रीयता जहाँ नियमों के अनुशासन में बंधकर चमचमाती है, लोक वहाँ अपनी उन्मुक्तता और सहजता से रीझता है। तीजन बाई ने शास्त्र को लोक के आचमन से ऐसा पवित्र और व्यावहारिक बना दिया कि व्यास की संस्कृत का भव्य प्रासाद, छत्तीसगढ़ी की सोंधी सुवास से महक उठा। आज जब वह महान स्वर विलीन हो गया है, तो ऐसा लगता है कि हमारी लोक-परंपरा का एक सुदृढ़ स्तंभ ढह गया है। वह तंबूरा अब शांत है, जो कभी काल के गाल पर थाप देता प्रतीत होता था।
भारतीय संस्कृति के फलक पर तीजन बाई का अवदान इस रूप में हमेशा अक्षुण्ण रहेगा कि उन्होंने अभिजात्य और लोक के बीच के उस कल्पित पुल को अपनी हुंकार से ढहा दिया, जो कला को दीर्घाओं और महलों की बपौती समझता था। उन्होंने सिद्ध किया कि कला का असली सिंहासन तो जनमानस का हृदय है। उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिले। उनका जाना एक पूरी मौखिक वाचिक पीठ का सूना हो जाना है। वे साक्षात लोक की सरस्वती थीं, जिन्होंने अपने सुदीर्घ जीवन में पांडवों की गाथा गाते-गाते स्वयं को भी इतिहास के अमर पृष्ठों में दर्ज करा लिया। उनके पैरों के घुंघरू और तंबूरे की झंकार ने जो लकीर खींची है, वह भारतीय लोक-कला के इतिहास में हमेशा स्वर्ण अक्षरों में चमकती रहेगी।

पुरु शर्मा
(युवा लेखक।संस्कृति एवं लोक कलाओं पर निरंतर लिखते रहते हैं।)

