प्रेम’ जीवन की प्राणवायु है- प्रेम ना हो तो सृष्टि चक्र रुक जाएगा। वस्तुतः यही संदेश देने के लिए सृष्टि के
नियंता का पृथ्वी पर अवतरण हुआ और जन्म लीला को इसके लिए माध्यम बनाया गया ।जन्माष्टमी उसी पुण्य लीला के स्मरण का दिवस है !
द्वापर युग में जब सत, और त्रेता के मापदंड तेजी से बदल रहे थे, श्रीकृष्ण ने पूर्ण अवतार लेकर सिद्ध किया कि अपना धर्म (स्वधर्म) युग -काल और परिस्थिति के अनुसार तय किया जाता है तभी तो उन्होंने इंद्र पूजा की जगह गोवर्धन पूजा को महत्व दिया और इसके लिए संघर्ष भी किया !
यदि थोड़ी गहराई से देखें तो यहीं से कृष्ण अपने अवतार का मंतव्य स्पष्ट कर देते हैं ! उनका संदेश स्पष्ट है कि इंद्रियों की नहीं, इंद्रियों को वृद्धि देने वाले (वर्धन करना )की पूजा करनी चाहिए, इसे और स्पष्ट करते हैं कि गो + वर्धन यहां, गौ, से आशय हमारी दस इंद्रियों से और वर्धन से आशय उसको पोषित करके संभालने से है ।इसलिए कृष्ण को गोपाल भी कहा जाता है ।आशय स्पष्ट है कि दूर कहीं स्वर्ग में बैठे देवता की पूजा मत करो, अपनी कर्म इंद्रियों और ज्ञान इंद्रियों की परवाह करो, क्योंकि यही मुक्ति का साधन बनेगी।अर्थात अपने देव आप बनो।गोविंदा गोपाला का सीधा सा अर्थ यही है कि जो हमारी इंद्रियों को पालित – पोषित- नियंत्रित करें।इसे गाय से जोड़ना तो बस ललित वृद्धि भर है !
कृष्ण का यह संदेश प्रारंभ से ही मुखर होता है और, शनै- शनै प्रगाढ़ होता है ! गोपियों के प्रसंग भी इसी तथ्य को बल देते हैं !’ गोपी ‘ का ‘गो’ भी इंद्रियों की ही सूचक है और ‘गोपियाँ” कोई और नहीं बल्कि सिद्ध साधक गण ही हैं ! इस दृष्टि से देखें तो हर साधक आज भी गोपी है और उसका इष्ट कृष्ण है ! यही है जितनी गोपी उतने कृष्ण का राज ओर “महारास ” आज भी जारी है ! आज भी जब कोई साधक अपने इष्ट का साथ पाता है तो मोह को खत्म करने के कारण वही रात्री “मोहरात्रि” हो जाती है ।जन्माष्टमी की रात्रि को “मोहरात्रि” कहने का यह भी एक कारण है !
चर्चा शुरू की थी ” स्वधर्म “से तो उसी पर आकर कह सकते हैं कि गीता “कृष्ण”की” स्वधर्म” उद्घोषणा का सबसे सशक्त हस्ताक्षर है ! कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि में परेशान अर्जुन शस्त्र एक तरफ़ रख देते हैं और दोनों सेनाओं के मध्य कृष्ण उन्हें स्वधर्म का पालन करने हेतु आंदोलित करते हैं ! अद्भुत समय, अद्भुत संयोग, और अद्भुत गीता..!
आज के संदर्भ में लगभग 5000 साल पुराना घटनाक्रम देखिए- अर्जुन आप स्वयं है, कुरुक्षेत्र आपका जीवन हैं, पांडव सेना “राग” है, कौरव सेना “द्वेष ” है ।राग और द्वेष के मध्य क्या करना उचित है और क्या नहीं,यही किंकर्तव्यविमूड़ता अर्जुन का भी द्वंद है और आपका भी ! कृष्ण अवतरित होते हैं “सारथी” बनकर अर्थात “सारतत्व” लेकर कि, ” पराए” धर्म के पालन से अपने धर्म में मरना भी श्रेष्ठ है,क्योंकि तुम्हें कोई मार नहीं सकता है ! तुम सदा हो, सदा रहोगे, मेरी तरह मेरे साथ….!
वाकई शांति की आवश्यकता युद्ध क्षेत्र में ही होती है ! “गीता “वस्तुतः युद्धक्षेत्र में प्रदत्त शांति का सबसे बड़ा उपहार है ! यहां धर्म से आशय हिंदू मुस्लिम, सिख इसाई आदि से नहीं है।यह सब तो संप्रदाय हैं ! धर्म का अर्थ होता है जो आप को धारण करे अर्थात धारयते इति धर्म: ! अतः कृष्ण यह कह रहे हैं कि जो भी आपका धर्म है उसे तटस्थ होकर राग द्वेष के बगैर पूरा कीजिए तो जीवन युद्ध के कुरुक्षेत्र में आपको विजय श्री मिलेगी ! जो भी आपका न्यायोचित कार्य है उसे ईमानदारी से कीजिए, यही धर्म है ! किसी मंदिर, किसी मूर्ति, कोई आडंबर कोई कर्मकांड या व्रत उपवास को नहीं अपितु अपने जीवन के प्रति सार्थक सात्विक भाव को साधने की प्रक्रिया को ही पूजा कहते हैं !
सारांशत: कृष्ण के जीवन की प्रत्येक घटना जन्म से लेकर शरीरांत तक यह सिद्ध करती है कि जीवन को युद्ध मत बनाओ;उसे समस्या नहीं समाधान बनाना है ! कारागृह में जन्म अर्थात संदेश यही कि संसार का बंधन कारागृह जैसा है । “पूतना का वध” अर्थात रिश्ते ममतामई होने का भ्रम देते है । ” कालियामर्दन” अर्थात राग और काम को समाप्त करना पड़ेगा,।”गोपी लीला” अर्थात प्रकृति के प्रति पूर्ण समर्पित रहना होगा।” राधा लीला” अर्थात बड़े उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए छोटे सुखों का स्वेच्छा से त्याग करना पड़ेगा ।द्वारका को बसाने का आशय है कि अपने उचित उद्देश्य को कभी नहीं छोड़ना,चाहे उसके लिए अपना कुछ भी छोड़ना पड़े ।और अंततः “गीता “कृष्ण के जीवन का उच्चतम बिंदु “स्वधर्म- स्वकर्म “की उदात्त अवधारणा…!
आशय यह है कि कृष्ण कोरे उपदेशक नहीं है।जो वह कह रहे हैं वहीं उन्होंने करके भी दिखाया है। हर कष्ट के समय उनकी बंसी बजती रही है,अर्थात अंदर का आमोद रुका नहीं है ! सतत जीवन धारा बहती रही है ” हरि अनंत हरि कथा अनंता ” की तर्ज पर कृष्ण अनंत है,पर हम अंत में कह सकते हैं कि दुर्भाग्यवश हमने गीता की पूजा की, उसकी कसमें खाई पर उसके मर्म को समझने का प्रयास नहीं किया।आवश्यकता है कृष्ण को समझने की ,आत्मसात करने की।फिर हम ही “राधा” हैं , हम ही “मीरा” है और हम ही “अर्जुन” हैं,क्योंकि कृष्ण तो सदा ही है । स्वयं उन्होंने ही कहा है यदा- यदा ही धर्मस्य……. !

डॉ द्वारका हरदेनियॉं
(लेखक ने कृष्ण भक्ति काव्य परंपरा के प्रसिद्ध ग्रंथ “कन्हावत” पर महत्वपूर्ण शोध किया है)


The Karmayog, Bhaktiyog and Gyanyog of Srimad Bhagavad Gita are relevant all the times and guiding principles of humankind.A good write up on the eve of Happy Janmashtami 🙏