संग्रह मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। यह आदिम काल से ही मनुष्यों में मौजूद रही है। भविष्य अथवा आपातकाल के लिए कंदराओं में खाद्य सामग्री संग्रहित करने से लेकर,अपने कुल- वंश का महिमा मंडन करने वाली वस्तुओं के संग्रह तक,यह प्रवृत्ति निर्वाध गतिमान है।
पुराने राजे-रजवाड़ों के वंशज आज भी अपनी बैठक की दीवारों पर वन्यजीवों और पुराने हथियारों की ट्रॉफी सजाकर रखते हैं। ऐसे संग्रह और उनके प्रदर्शन के पीछे यद्यपि अपने आपको समाज में कुछ विशिष्ट साबित करने का भाव होता है,लेकिन इससे प्राचीन वस्तुओं का संग्रहण और संरक्षण तो होता ही है।
अपने कुल-वंश को गौरवान्वित करने वाली वस्तुओं और प्रतीक चिन्हों को संग्रहित-प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति केवल राजे-रजवाड़ों के वंशजों में ही प्रचलित हो,ऐसा नहीं है।राजनेताओं,
साहित्यकारों,व्यापारियों,कृषकों आदि के वंशज भी अपने पूर्वजों से संबंधित वस्तुएं सहेजकर रखते रहे हैं।
संग्रह की यह प्रवृत्ति जब ‘स्वांत: सुखाय’ और आत्मश्लाघा के संकुचित दायरे में कैद रहती है,तब घर के बैठकखाने सजते है;और जब इसे ‘सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय और सर्वजन दर्शनाय’ के उद्दाम भाव का स्पर्श मिलता है,तब सार्वजनिक संग्रहालय आकार लेते हैं।
आईए,संग्रहालयों के विकास क्रम पर एक दृष्टि डालते हैं। शुरुआत पश्चिमी जगत से करते हैं।
प्राचीन रोम और यूनान में व्यक्तिगत संग्रह के प्रति विशेष रुझान रहा है। यूनानी धर्मस्थलों में विजित स्थान की मूर्तियां और अन्य वस्तुएं संग्रहित की जाती रही हैं। मिश्र के ऐलेक्जेंड्रिया शहर में एक ऐसे शिक्षा संस्थान का जिक्र मिलता है,जिसमें 288 ईसा पूर्व मूर्तियां,पूजा की वस्तुएं,दान सामग्रियां,खगोल यंत्र,हाथी दांत आदि संग्रहित किए जाते थे।
यूरोपीय देशों के सामंत,चर्च के उच्च पदासीन पदाधिकारी और धनिक लोग गहने,मूर्तियां,मोहरें सोने-चांदी के सिक्के,कीमती वस्त्र और हस्तलिखित ग्रंथ आदि का संग्रह किया करते थे। लेकिन यह सार्वजनिक संग्रहालय नहीं थे,और प्राय: निजी निवासों, पुरानी इमारतों अथवा चर्च के किसी कक्ष में ही वस्तुओं का भंडारण किया जाता था। इस संग्रहण अथवा भंडारण के पीछे एक तरह से वेश कीमती वस्तुओं का संपत्ति के रूप में एकत्रीकरण ही प्रमुख ध्येय हुआ करता था।
पुनर्जागरण काल में जब कलाकृतियों,पुरासंपदा और अन्य प्राचीन जीवनोपयोगी वस्तुओं का प्रयोग ज्ञानार्जन के लिए करने की समझ पनपी,तब पृथक ‘वीथिका’ का निर्माण प्रारंभ हुआ,और यूनानी शब्द ‘म्यूजेज’से ‘म्यूजियम’ शब्द प्रचलन में आया।
‘एशमोलियन संग्रहालय’ विश्व का पहला सार्वजनिक संग्रहालय माना जाता है,जो 1683 में ऑक्सफोर्ड (इंग्लैंड)में एलियास एशमोल द्वारा दान दिए गए निजी संग्रह से प्रारंभ हुआ था।
1759 में उद्घाटित हुआ ‘ब्रिटिश संग्रहालय’ विश्व के सबसे प्रसिद्ध और प्राचीन संग्रहालयों में से एक है,जिसमें विश्व भर की 80 लाख से अधिक विविध वस्तुओं और कलाकृतियों का विशाल संग्रह मौजूद है।
19वीं शताब्दी में यूरोप के साथ-साथ अन्य देशों में भी सार्वजनिक संग्रहालयों की स्थापना का सिलसिला प्रारंभ हुआ,जो निरंतर जारी है।
अमेरिका में संग्रहालय की स्थापना का क्रम 1773 से प्रारंभ हुआ,जब कैरोलिना में ‘चार्ल्सटन संग्रहालय’ की स्थापना हुई। इसके बाद ललित कला संग्रहालय (बोस्टन) और मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम का ऑफ आर्ट (न्यूयॉर्क) जैसे संग्रहालय अस्तित्व में आए।
वाशिंगटन स्थित स्मिथसोनियन संस्थान संग्रहालयों के संरक्षण,संवर्धन और संचालन के लिए महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। वर्तमान में यह संस्थान अमेरिका के 21 संग्रहालय और 14 अनुसंधान केंद्रों का प्रबंधन कुशलतापूर्वक संभाल रहा है।
विश्व के अन्य प्रमुख संग्रहालय हैं -पेरिस का लूवर संग्रहालय, इटली का वेटिकन संग्रहालय, चीन का राष्ट्रीय संग्रहालय,जापान का टोक्यो राष्ट्रीय संग्रहालय,जर्मनी का मानव विज्ञान राष्ट्रीय संग्रहालय, ब्रिटेन का विक्टोरिया और अल्बर्ट संग्रहालय और दक्षिण कोरिया का राष्ट्रीय संग्रहालय।
विश्व के अन्य देशों की तरह भारत में भी निजी संग्रह तो अस्तित्व में रहे हैं,लेकिन संग्रहालय की विधिवत शुरुआत 1814 में स्थापित एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल,कोलकाता की स्थापना से मानी जाती है। समिति द्वारा स्थापित संग्रहालय का प्रारंभिक नाम ‘एशियाटिक सोसाइटी म्यूजियम’ था, जो बाद में ‘इंपीरियल म्यूजियम’ के नाम से जाना गया। आजकल इसे ‘भारतीय संग्रहालय’ कहा जाता है। यह भारत का पहला संग्रहालय भी है,और सबसे समृद्ध भी।
एक रिपोर्ट के अनुसार 1936 में भारत में कुल 105 संग्रहालय थे। उनमें से सिर्फ 80 ही ऐसे थे,जिन्हें संग्रहालय की श्रेणी में रखा जा सकता था।
यह संख्या संग्रहालय स्थापित करने की भरपूर संभावनाओं और देश के विशाल आकार के अनुपात में,मामूली कही जा सकती है। लेकिन इस तथ्य को भी ध्यान में रखा जाना जरूरी है कि उस दौरान देश स्वतंत्र नहीं था,और भारतीय नेतृत्व का सर्वोपरी लक्ष्य देश को आजाद कराना था। फिर संग्रहालय जैसे अधुनातन विचार से आम जनमानस का जुड़ाव भी प्रायः नहीं के बराबर ही था। बहुत थोड़ी सी ही पुरा सामग्री तब तक व्यक्तिगत अथवा सार्वजनिक संग्रहालयों में संरक्षित की जा सकी थी,जबकि
देश की विपुल पुरा संपदा बगैर किसी संरक्षण के यूं ही यहां-वहां बिखरी हुई पड़ी थी। इसका फायदा उठाया उन लोगों ने जो इसकी कीमत बखूबी जानते थे। ऐसे लोगों ने भारतीय सांस्कृतिक विरासत की सैकड़ो अनमोल कलाकृतियों को दुनिया भर के संस्थागत और व्यक्तिगत संग्राहकों तक पहुंचा दिया।
आज विश्व का शायद ही कोई ऐसा संग्रहालय होगा, जिसमें भारत की कोई ना कोई अनमोल धरोहर प्रदर्शित न हो।
शनै शनै स्थितियां बदलीं,और प्राचीन धरोहरों को संरक्षित किए जाने की भावना बलवती हुई। यद्यपि आम लोगों में विरासत और धरोहरों के संरक्षण के प्रति वैसा जिम्मेदारी का भाव तो अभी भी प्रायः नदारत ही है,जैसा पश्चिमी देशों के नागरिकों में देखने को मिलता है; लेकिन शासकीय स्तर पर इसके लिए सराहनीय प्रयास हुए हैं। राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में कुछ निजी संग्रहालय भी सुरुचिपूर्ण तरीके से विकसित किए गए हैं।
स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव वर्ष तक आते-आते कला,संस्कृति,साहित्य,इतिहास,विज्ञान,मानव विज्ञान सहित मानव जीवन के लिए जरूरी लगभग हर विषय पर केंद्रित सहस्त्राधिक संग्रहालय देश में स्थापित किए जा चुके हैं।
देश के प्रमुख संग्रहालय हैं-भारतीय संग्रहालय (कोलकाता),सालार जंग म्यूजियम(हैदराबाद), नेशनल म्यूजियम(नई दिल्ली),छत्रपति शिवाजी महाराज वस्तु संग्रहालय(मुंबई),शासकीय संग्रहालय (चेन्नई),डॉ भाऊ दाजी लाड़ म्यूजियम(मुंबई),सारनाथ म्यूजियम(सारनाथ), नेशनल गांधी म्यूजियम(नई दिल्ली),सरकारी संग्रहालय और कला गैलरी(चंडीगढ़),विक्टोरिया मेमोरियल हॉल (कोलकाता),शिवालिक फॉसिल पार्क (हिमाचल प्रदेश),राज्य संग्रहालय
(भोपाल),इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय(भोपाल),अल्बर्ट हॉल संग्रहालय (जयपुर),राष्ट्रीय रेल संग्रहालय(नई दिल्ली), कैलिको म्यूजियम ऑफ टेक्सटाइल्स
(अहमदाबाद),शंकर अंतर्राष्ट्रीय गुड़िया संग्रहालय(दिल्ली), नेपियर संग्रहालय
(तिरुअनंतपुरम),एच ए एल हेरीटेज सेंटर और एयरोस्पेस संग्रहालय(बेंगलुरु), राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय (बेंगलुरु) तथा माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान (भोपाल)।
यह संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है,जो एक शुभ लक्षण है। यह रुझान बताता है कि एक समाज के रूप में हम अपनी समृद्ध धरोहरों के संरक्षण के प्रति देर से ही सही,सचेत हुए हैं।
भारत में जनजातीय समाज की कला-संस्कृति, हस्तशिल्प,नृत्य-गान एवं जीवन शैली का विशिष्ट महत्व रहा है। लंबे अरसे तक इसे संरक्षित करने का कोई विशेष प्रयास नहीं हुआ। लेकिन भोपाल की श्यामला पहाड़ी पर स्थित ‘इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय’ बहुत हद तक इस शिकायत का निवारण कर देता है।
200 एकड़ में फैला मानव संग्रहालय,मानव विकास और जनजातीय जीवन की कहानी जीवंत रूप से प्रस्तुत करता है। भारत की लगभग समस्त जनजातियों के आवास, पारंपरिक वाद्य यंत्र,कृषि उपकरण,वेशभूषा और अनुष्ठान आदि में प्रयुक्त वस्तुओं का अद्भुत संग्रह है मानव संग्रहालय की मुक्तकाशी प्रदर्शिनियों में।
संग्रहालय में प्रदर्शित प्रादर्श उनके मूल स्थानों से प्राप्त किए गए हैं,जिन्हें संबंधित जनजातीय समाज के पारंपरिक कारीगरों ने संग्रहालय परिसर में पुनरस्थापित किया है। श्यामला पहाड़ी पर पूर्व से ही मौजूद प्रागैतिहासिक काल के 32 शैलाश्रयों के बीच स्थित यह जनजातीय संरचनाएं वैज्ञानिक दृष्टिकोण और कलात्मक उत्कृष्टता के समन्वय का अद्भुत उदाहरण हैं।

भोपाल के जनजातीय संग्रहालय में जनजातीय कला-संस्कृति,इतिहास,जीवन-शैली और रीति रिवाजों से संबंधित प्रादर्शों को सुरुचिपूर्ण तरीके से संरक्षित और प्रदर्शित किया गया है। जनजातीय नायकों टंट्या भील,भीमा नायक,खज्या नायक, संग्राम सिंह,शंकर शाह,रघुनाथ शाह,रानी दुर्गावती, बादल भोई,राजा भूत सिंह, ढेलन शाह आदि के जीवन चरित्र को भी संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है। केवल राजधानी भोपाल में ही नहीं छिंदवाड़ा,जबलपुर,खंडवा और बड़वानी जैसे स्थानों पर भी जनजातीय संग्रहालय और स्मारक स्थापित किए गए हैं।
जनजातीय समाज की विरासत को संरक्षित करने और राष्ट्र निर्माण में जनजातीय समाज के योगदान से भावी पीढ़ियों को अवगत कराने के उद्देश्य से अन्य राज्यों में भी जनजातीय संग्रहालय स्थापित किए गए हैं।
जनजातीय विरासत को अपने अंक में समेटे देश के अन्य संग्रहालय हैं –
बिरसा मुंडा संग्रहालय(रांची), उड़ीसा राज्य जनजातीय संग्रहालय(भुवनेश्वर),अराकू जनजातीय संग्रहालय(आंध्र प्रदेश), डॉन बॉस्को सेंटर फॉर इंडीजीनस कल्चर्स(शिलांग), जनजातीय संग्रहालय (मैसूर),शहीद वीर नारायण सिंह स्मारक(रायपुर), जनजातीय संग्रहालय(राजपीपला), और रानी दुर्गावती संग्रहालय(जबलपुर) आदि।

संग्रहालयों के शहर के नाम से विख्यात भोपाल में स्थित ‘माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान’ एक ऐसा संग्रहालय है,जो ना केवल अनूठा है,वरन् देश में अपनी तरह का इकलौता भी है। संग्रहालय में लगभग 5 करोड़ पृष्ठों की दुर्लभ और महत्वपूर्ण संदर्भ सामग्री,लगभग पौने दो लाख संदर्भ ग्रंथ, 26000 से अधिक शीर्षक समाचार पत्र और पत्रिकाएं, 5000 हस्तलिखित पांडुलिपियां और पोथियां, लगभग 5000 संदर्भ फाइलें, साहित्यकारों,पत्रकारों और विशिष्ट व्यक्तियों के 10000 से अधिक पत्र और 200 से अधिक ऐतिहासिक महत्व के रेडियो, ग्रामोफोन,कैमरे,टेप रिकॉर्डर,टाइपराइटर आदि संग्रहित हैं। पिछले चार दशकों में लगभग 1300 शोधार्थी संग्रहालय की संदर्भ सामग्री का उपयोग कर पीएचडी/डीलिट की उपाधियां अर्जित कर चुके हैं। देश के अलावा लगभग 20 अन्य देशों के हजारों जिज्ञासु अब तक सप्रे संग्रहालय में संग्रहित ज्ञान संपदा का अवलोकन कर चुके हैं।
भारत की लगभग सभी भाषाओं की ज्ञान संपदा अपने अंक में सहेजे सप्रे संग्रहालय को देश के प्रबुद्ध जनों ने ‘ज्ञान तीर्थ’ की संज्ञा दी है,जो विरासत के संरक्षण और संवर्धन के क्षेत्र में इसके महत्व और योगदान को देखते हुए एकदम सटीक विशेषण है।
संग्रहालय की स्थापना ही नहीं इसका संचालन भी विशिष्ट कौशल की मांग करता है। इसके लिए 1952 में पहल की गई,जिसके तहत देश में पहली बार एम एस विश्वविद्यालय,बड़ौदा में संग्रहालय प्रबंधन का द्विवर्षीय पाठ्यक्रम प्रारंभ किया गया था। आज देश के अनेक विश्वविद्यालयों में संग्रहालय प्रबंधन की शिक्षा प्रदान की जा रही है।

संग्रहालय मनुष्य के भूत-वर्तमान और भविष्य के बीच संदर्भ सेतु की भूमिका निभाते हैं। यह हमारा परिचय अतीत से कराते हैं,जिससे हमें ज्ञान प्राप्त होता है और सबक भी मिलता है। अतीत से प्राप्त ज्ञान और सबक हमारे भविष्य के मार्ग को प्रशस्त करते हैं। इस दृष्टि से संग्रहालय महज पर्यटन केंद्र नहीं, चिरकालिक महत्व के संस्थान हैं।
अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय परिषद (आईकाम) ने संग्रहालय को कुछ इस तरह से परिभाषित किया है- “संग्रहालय लाभ-हानि के सोच से परे समाज की सेवा में संलग्न स्थाई संस्थान होते हैं। यह समाज के विकास के लिए कार्य करते हैं। संग्रहालय मानव और उनके पर्यावास के साक्ष्य, विविध सामग्री का संकलन,संग्रहण और संरक्षण करते हैं। उन्हें प्रदर्शित करते हैं। शोध अनुसंधान में सहायक बनते हैं। अध्ययन शिक्षा और मनोरंजन का उद्देश्य पूरा करते हैं।”
आईकाम ने मानव जीवन में संग्रहालयों के महत्व और उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए ही 18 मई को ‘विश्व संग्रहालय दिवस’ के रूप में मान्य किया है। संग्रहालय दिवस मनाने का यह सिलसिला 1977 में प्रारंभ हुआ,और आज विश्व के लगभग सभी देश संग्रहालय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित करने के लिए इस दिन विविध गतिविधियां आयोजित करते हैं।
भारत में भी संग्रहालयों की स्थापना से लेकर उनके संचालन तक की स्थितियों में उत्तरोत्तर प्रगति हुई है,लेकिन सामाजिक सहभागिता उस स्तर तक नहीं पहुंची है,जैसी पश्चिमी देशों में दिखाई देती है। भारत में आज भी संग्रहालय की स्थापना और उनका संचालन करना मुख्यतः सरकार की ही जवाबदारी समझी जाती है। निजी क्षेत्र अथवा न्यासों द्वारा संचालित संग्रहालयों की संख्या अपेक्षाकृत कम है।

निःसंदेह भारत के कुछ निजी और सार्वजनिक संग्रहालयों ने अपने स्थापत्य,जीवंत प्रादर्शों और उत्कृष्ट दुर्लभ कलाकृतियों के लिए विश्वव्यापी ख्याति अर्जित की है,लेकिन इस क्षेत्र में मौजूद अपार संभावनाओं और क्षमताओं के दोहन के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
इन संभावनाओं को साकार स्वरूप प्रदान करना केवल सरकार की ही नही,समाज की भी जिम्मेदारी है,क्योंकि संग्रहालय अंततः समाज की ही थाती हैं। इस नाते संग्रहालयों की स्थापना, संरक्षण और संवर्धन में नागरिकों की सक्रिय भूमिका न केवल अपेक्षित है वरन् अपरिहार्य भी है।
*अरविन्द श्रीधर
निदेशक
माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान,भोपाल (मध्य प्रदेश)


सुन्दर शोधपूर्ण आलेख संग्रहालय दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं💐