नरसिंहपुर जिले के दो उत्पादों – गुड़ और बरमान के भटे को जीआई टैग

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लंबे अरसे की प्रतीक्षा के बाद नरसिंहपुर जिले के दो उत्पादों गुड़ और बरमान के भटे को जीआई टैग मिल गया है । दोनों उत्पादों को यह तमगा मिलने से किसान लाभान्वित होंगे।

पुण्य सलिला नर्मदा ने जिले की मिट्टी ,हवा, पानी को कई तरह की खासियत बख्शी है । एशिया की सबसे अधिक उपजाऊ जमीन जिले में है। प्रदेश का सबसे अधिक गन्ना (65%)जिले में होता है ।
यहां के गन्ने में विभिन्न प्रदेशों के गन्ना की अपेक्षा शुगर रिकवरी बहुत अधिक है । जबकि जिले में सीमित प्रजातियां है । गन्ना उत्पादक जिला होने के कारण यहां पर करीब आधा दर्जन शुगर मिलें और गुड़ बनाने की हजारों भट्टियां सीजन में काम करती हैं । यहां के गुड़ में आयरन और कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है । इसे जीआई टैग मिलना, गुड़ बनाने वाले किसानों के लिए सुखद खबर है।

इसी तरह जिले के बरमान के भटे को लंबी प्रतीक्षा के बाद जीआई तमगा मिल पाया है । नर्मदा नदी की बलुआ मिट्टी और कम तापमान के कारण यहां के भटे का स्वाद और गुणवत्ता उत्कृष्ट माने जाते हैं। इसमें सौंधी मिठास है।भटे में बीज नहीं होते । भटे आकार में बड़े व नरम होते हैं। इसलिए जायकेदार भर्ते के लिए इसकी मांग हमेशा बनी रहती है ।

इसी तरह पड़ोसी जिले के सिवनी का सीताफल और जबलपुर की पौष्टिक हरी मटर भी जी आई टैग से नवाजी गई है । सिवनी जिले में 656 हैक्टेयर में 6500 मीट्रिक टन सीताफल का उत्पादन होता है। यहां एक फल का वजन 600 से लेकर 800- 900 ग्राम तक होता है ।जिसके कारण इसे जंबो सीताफल कहा जाता है । दूसरी तरफ नरसिंहपुर के साथ-साथ जबलपुर में पैदा होने वाली पौष्टिक हरी मटर का स्वाद भी जायकेदार होता है। यहां 40 से 60 दिन की फसल का उत्पादन वर्ष 2018-19 में 52,500 टन रहा ।
महाकौशल अंचल के तालाबों में होने वाला सिंघाड़ा भी जीआई टैग मिलने की प्रतीक्षा में है। जबलपुर और आसपास के लगभग 4500 से लेकर 5000 किसान सिंघाड़े की खेती करते हैं । इसमें 7 महीने की कड़ी मेहनत लगती है । यहां का सिंघाड़ा भी लाजवाब है ।
मध्य प्रदेश अब देश का ऐसा अब्बल राज्य है,जहां एक साथ 12 कृषि उत्पादों को जीआई टैग मिला है। टैग मिलने से इन उत्पादों की बाजार में पूछ परख बढ़ेगी । निर्यात बढ़ेगा। किसानों को उपज का बेहतर दाम मिलेगा। इसी तरह नर्मदा क्षेत्र डिंडोरी जिले में भी सिताही कुटकी , नागदमन कुटकी को जीआई टैग मिला है । कटनी की क्षत्रिय धान और बैगानी अरहर भी इस टैग में शामिल किए गए हैं। सरकार का दावा है कि वर्ष 2030 तक उद्यानकी फसलों का क्षेत्रफल 30 लाख हेक्टर तक किया जाएगा । कृषक कल्याण वर्ष में 12 कृषि उत्पादों को जी आई टैग मिलना एक बड़ी उपलब्धि है।

यह है जी आई टैग

जीआई मतलब जियोग्राफिकल इंडिकेशन अर्थात भौगोलिक संकेत । यह कई तरह के परीक्षणों के बाद किसी उत्पाद को प्रदान किया जाता है -जैसे उत्पाद, गुणवत्ता और अलग खासियत। ऐसी गुणवत्ता और खासियत अन्य स्थानों पर नहीं पाई जाती। जीआई रजिस्ट्री कार्यालय चेन्नई यह टैग प्रदान करती है । जिस क्षेत्र विशेष के लिए यह टैग मिलता है उस क्षेत्र के नाम से ही उत्पाद पहचाना जाता है। अन्य कोई इस नाम से उत्पादन और विक्रय नहीं कर सकता । एक तरह यह एक पेटेंट प्रोडक्शन हो जाता है।

जीआई टैग प्राप्त करने वाली फसलों में गुना का धनिया, बैतूल का गजरिया आम, खरगोन की लाल मिर्च, मांडू की खुरासानी इमली, मालवी आलू और गराड़ू और अलीराजपुर का नूरजहां आम शामिल हैं।

इसके अलावा बुरहानपुर का केला, इंदौरी जीरावन, रतलाम की सैलाना बालम ककड़ी और छतरपुर का पान,उज्जैन की इमली, अलीराजपुर का अचारी आम, मालवा की सफेद प्याज, झाबुआ की दाल पानिया, मंदसौर का देशी जीरा, बुरहानपुर की जलेबी और अशोक नगर की खिरनी को भी जीआई टैग दिलाने के लिए प्रस्ताव भेजा गया है।

डॉ बृजेश शर्मा
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विगत कई वर्षों से इनकी आंचलिक महत्व की खबरों का प्रकाशन विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हो रहा है।)

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